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अपात्रक श्राद्ध का आरंभ कब हुआ?
“मिथिला के शिष्ट-विज्ञ जनों का व्यवहार ही धर्म का वास्तविक निर्णय है, अल्पज्ञ स्वेच्छाचारियों का नहीं।” वर्त्तमान काल में श्राद्ध का स्वरूप अत्यधिक विकृत हो गया है और पूर्वाचार्यों का अनुकरण करते हुये ही पुनः संशोधन की आवश्यकता को देखते हुये “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” नाम से संशोधित अपात्रक श्राद्ध विधि संपादन में है। इस पुनीत…
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एकादशाह
निर्देश : जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त। जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त। जिस क्रिया में अ.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त। जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है…
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दान विधि
वर्त्तमान में महापात्र का भी कुशोदक पूर्वक प्रतिग्रहाधिकार सुरक्षित नहीं रहा और अब उक्त विधि से दान नहीं किया जा सकता। अर्थात अब दान महापात्र को देना हो अथवा पुरोहित को दोनों में ही कुशाब्राह्मण (दर्भबटु) को दान किया जायेगा। एक विषय महत्वपूर्ण है वो यह कि महापात्र को जो दान दिया जाता है वो…
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उत्सर्ग
चर्चा के जो दो मूल प्रश्न हैं वो हैं : श्राद्ध में महापात्र को दान देने के पश्चात् पुरोहित को भी दान क्यों दिया जाता है ? प्राङ्गणकृत्य सामान्योत्सर्ग एकादशाह को करें या द्वादशाह को ? धर्म की रक्षा के लिये यह आवश्यक है कि उसका ज्ञान हो और ज्ञान के लिये यह आवश्यक है…
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मासिक श्राद्ध
ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण, पवित्रीकरण, संध्या वा सूर्यार्घ्य दान पूर्वक गायत्री जप, तर्पण व तिलांजलि, पंचदेवता-विष्णुपूजन, अंगारभ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादन, रक्षादीप प्रज्वलन, दिग्बन्धन, पाक आदि करके आगे की यथाव्यवस्था क्रिया आरम्भ करे। पवित्रीकरणादि का उचित क्रम : तिलकधारण, शिखाग्रंथि, पवित्रीधारण, पवित्रीकरण, आचमन इस प्रकार है। दिग्रक्षण मंत्र : ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम । इदं श्राद्धं हृषीकेश…
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सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं
“सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” (प्रथम खण्ड) सम्पादक : पण्डित दिगम्बर झा संशोधन प्रस्तावक : विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज प्रथम संस्करण (PDF) – गंगादशहरा सम्वत् २०८३ (२६/५/२०२६) ©कॉपीराइट : यह संशोधन श्राद्ध की विकृतियों का निवारण करने के उद्देश्य से किया गया है और इसपर ©कॉपीराइट अधिकार भी बनेगा किन्तु मंत्रों और विधियों पर नहीं अपितु विश्लेषण…
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सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें
॥ मङ्गलाचरण ॥ यस्याङ्के च विभाति शैलसुतयादेवो जगत्कारणम्विघ्नानां शमनं नमामि सततंलम्बोदरं श्यामलम्।सिद्धिं यः कुरुते स्मृतोऽपि सहसाकार्येषु सर्वार्थदःतं देवं गिरिधारि-मानस-चरंविघ्नेशमुच्चैर्भजे ॥१॥लक्ष्मीकान्तमजं निरस्तकुहकंविश्वेश्वरं शाश्वतं,ध्येयं योगिभिरादिपूरुषमहोसंसारसिन्धूत्तरम्।दाता यः परमस्य सद्गतिविधेःप्रह्लादकारी हरिः,वन्दे तत्पदपङ्कजं हृतमलंविष्णोः पवित्रं सदा ॥२॥श्वेताब्जे विहरन्त्यगाध-मतिदावाग्देवता भारती,गङ्गा या सुरदीर्घिका त्रिपथगापापान्धकार-च्छिदा।वाणी-जाह्नवि-पाद-पद्मममलंध्यात्वा मुदा सर्वदा,ग्रन्थस्यास्य सुसिद्धये हि मनसायाचे प्रसीदन्तु मे ॥३॥ये लोकाः पितरः स्वधा-रति-रताःस्वर्गे स्थिताः सर्वदापुत्राणां शुभमङ्गलाशिषमुदाकुर्वन्ति ते पावनम्।श्राद्धेनात्र सुतर्पिताः प्रमुदितायच्छन्ति…
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क्रिया और मंत्रादि प्रयोग
स्नान हस्तद्वयमितं कार्यं वैश्वदेविक मंडलम्। तद्दक्षिणे चतुर्हस्तं पितृणामङ्घ्रिशोधनम् ॥लौगाक्षि उद्धृत (वीरमित्रोदय श्राद्ध प्रकाश) क्रिया और मंत्रादि प्रयोग वह भाग है जो कर्त्ता श्राद्ध में कर्म करता है अर्थात यह मुख्य भाग है। इसे मुख्य भाग स्वीकार करते हुये भी वर्त्तमान कालीन अर्थातुर अपण्डितों (कथित पण्डित) ने छिन्न-भिन्न कर रखा है और ये विभिन्न क्रियाओं की…
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अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
वृषोत्सर्ग शास्त्रों का अवलोकन करने पर सामर्थ्यवानों के लिये वृषोत्सर्ग पूर्वतः अनिवार्य प्रतीत होता है। जो सक्षम ही नहीं है उसके लिये अनिवार्य नहीं हो सकता क्योंकि अक्षम होने पर तो श्राद्ध का भी परिहार हो जाता है। अस्तु वर्त्तमान में बहुत सारे लोग श्राद्ध में भोज का तो सीमा से अधिक विस्तार करते हैं…