प्रस्तावना

जहाँ लगभग १०–१५ वर्ष पूर्व गिने-चुने ही श्राद्ध कर्म कराने वाले कर्मकांडी उपलब्ध होते थे, पुरोहित वर्ग प्रायः श्राद्ध करा ही नहीं पाते थे और रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जप आदि अनुष्ठान कराने वाले विद्वान पंडित भी यह कहने के लिए विवश होते थे कि “मैं इस कर्म में रुचि नहीं रखता, इससे दूर ही रहता हूँ”—यद्यपि वे भागवत-वेदादि का पाठ करने के लिए जाते भी थे। यह तो एक स्पष्ट विरोधाभास ही था कि वे प्रेत-कर्म (पितृ-कर्म) में सम्मिलित भी हो रहे थे और साथ ही उससे दूर रहने का कथन भी करते थे। पूर्व प्रकाशित “सुगम श्राद्ध विधि” ग्रंथ की उपादेयता यही सिद्ध हुई कि ऐसे सभी पंडित एवं पुरोहित भी वर्तमान काल में श्राद्ध कर्म को सीखने और विधिपूर्वक कराने लगे।

इस पुस्तक का मूल उद्देश्य ही यही था कि सामान्य विवेक से युक्त ब्राह्मण भी सुगमता से श्राद्ध कर्म कराना सीख सकें, और सफल भी रहा। मैं इसे अपना परम सौभाग्य मानता हूँ कि जगदीश्वर ने इस पवित्र कार्य के निमित्त मेरा चयन किया। इसी क्रम में अब मुझे आगे और भी गुरुतर उत्तरदायित्व प्राप्त हुआ है, जो मिथिला के गौरव एवं परंपरा के पूर्णतः अनुकूल है।

शास्त्र का भी यही वचन है कि “मिथिला व्यवहार” को ही धर्म का प्रामाणिक निर्णय मानना चाहिए। यहाँ ‘व्यवहार’ से तात्पर्य “शिष्ट एवं विज्ञ जनों के आचरण” से है, न कि अल्पज्ञ व स्वेच्छाचारी पुरुषों के आचरण से। मिथिला के शिष्ट-प्राज्ञ जनों का व्यवहार धर्म का निर्णय इसीलिए सिद्ध हुआ है, क्योंकि मिथिला अनादि काल से मनीषियों व शास्त्रवेत्ताओं की उद्गमस्थली रही है। मिथिला क्षेत्र की माटी में प्रज्ञा और विवेक की जो उर्वरता विद्यमान है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अस्तु, “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” पुस्तक मूलतः मिथिलादेशीय परंपरा पर आधारित है; तथापि यह अन्य क्षेत्रों/देशों के लिए भी शास्त्रविहित, निषिद्ध अथवा निष्कर्ष न प्राप्त होने की स्थिति में पूर्णतः उपयोगी सिद्ध होगी और सम्यक् मार्ग प्रदर्शित करेगी।

“सुगम श्राद्ध विधि” अपने तात्कालिक उद्देश्य में सर्वथा सफल रही, किंतु उसका संपादन व्यावहारिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही किया गया था। जो श्राद्ध कर्म में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए तो वह प्रारंभिक ज्ञान का आधार सिद्ध होगी, तथापि केवल व्यावहारिक दृष्टिकोण रहने के कारण उसमें अनेकानेक शास्त्रीय विसंगतियाँ भी समाहित रह गई थीं। इसका कारण यह था कि उस समय श्राद्ध को पूर्णतः शास्त्र-सम्मत बनाने की अपेक्षा उन लोगों के भय का निवारण करने पर बल दिया गया था, जो जटिलता के भय से श्राद्ध कर्म से ही विमुख हो जाते थे, ताकि उनके भय का समापन हो और पितृ-कर्म में रुचि उत्पन्न हो।

अब, जो कर्मकांडी श्राद्ध शास्त्र के वास्तविक विशेषज्ञ बनना चाहते हैं, उनके लिए “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” उत्कृष्ट पद्धति सिद्ध हो — ऐसा प्रामाणिक प्रयास किया गया है। वर्तमान काल में श्राद्ध कर्म के अनुष्ठान में जो अनेक विसंगतियाँ और भ्रांतियाँ उत्पन्न हो चुकी हैं (जिनमें से कुछ कलि के प्रभावस्वरूप भी हैं), उनका निराकरण करना परम आवश्यक है; और इस दिशा में यह एक सार्थक व सशक्त प्रयास किया गया है। साथ ही, यह ग्रंथ परवर्ती (आगामी) पीढ़ियों के लिए भ्रमों और दोषों का सम्मार्जन करने वाला सिद्ध होगा।

“सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में क्रिया-विधि आदि का सांगोपांग विस्तृत विश्लेषण करके इसे विद्वद्जनों हेतु मननयोग्य बनाया गया है। यदि निष्पक्ष भाव से मनन किया जाए, तो इसमें प्रस्तुत प्रमाणित तथ्यों को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। किंतु, जो शास्त्रदस्यु, मदांध, दुराग्रही और अपंडित हैं — उनके दर्प का दलन भी इसमें स्पष्टतः किया गया है; क्योंकि ऐसे अपंडित मूर्खाचार्यों में बौद्धिक जड़ता होती है और वे सीमा से अधिक दुराग्रह का पालन भी करते हैं, इस कारण वे न्यूनतम सम्मान के योग्य भी नहीं होते।

निष्कर्षतः, यह पुस्तक एक ओर जहाँ कर्मकांडी को श्राद्ध कर्म का निष्णात विशेषज्ञ बना सकती है, वहीं दूसरी ओर श्राद्ध में व्याप्त विकृतियों व विसंगतियों का समूल निस्तारण भी करेगी। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो भी इसे आत्मसात करके श्राद्ध संपादित करेगा, उसके पितरों की क्षुधा एवं तृषा का पूर्ण निवारण होगा; और जो दुराग्रही बनकर शास्त्र-मर्यादा की उपेक्षा करेगा, वह अपने ही पितरों को दुःखित और व्याकुल करेगा।

Scroll to Top