भाग 1, शीर्षक : ॥ दान विधि ॥ , उपशीर्षक – सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं, श्रेणी – एकादशाह

3 – गोदान विधि

  • तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • गाय को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।

  • उत्सर्ग : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां रुद्रदैवतां यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

तदनन्तर पुच्छोदकादि से ब्राह्मण यजमान को अभिसिक्त कर दे। गोदान के विषय में एक कर्म गोपुच्छेदक से तर्पण भी है किन्तु ये मिथिला के पूर्वाचार्यों ने कहीं भी स्वीकार नहीं किया है और न ही व्यवहार में प्रचलित है अस्तु उसकी आवश्यकता मिथिला में नहीं होती यही कहा जा सकता है। गोदान के अभाव में गोनिष्क्रय (मूल्य) दान किया जाता है, गोमूल्य के विषय में एक भ्रम है कि जो मन में आये वही कर सकता है किन्तु ऐसा नहीं है इसका ब्राह्मण द्वारा शास्त्रानुसार वर्त्तमान कालानुरूप निर्धारण किया जा सकता है एवं उसमें भी अक्षम होने पर उसका अर्द्ध, यदि यजमान उसमें भी अक्षम हो तो पुनः अर्द्ध उसमें भी सक्षम न होने पर ब्राह्मण जितने में सहमति प्रदान करें उतना भी मान्य होता है। गोनिष्क्रय में गोमूल्य उपस्थित करके ही दान करना चाहिये। गोदान के विषय में यह भी विशेष तथ्य है कि किसी पूर्वाचार्य ने दक्षिणकाल में गोदान नहीं स्वीकार किया है। सपात्रक श्राद्ध में एकोद्दिष्ट के मध्य ही पञ्चदान का विधान होना एक भिन्न पक्ष है जो अपात्रक में प्रयुक्त नहीं हो सकता अस्तु आरम्भ में ही उचित है। यह प्रायश्चित्त गोदान से भिन्न दान होता है एवं प्रायश्चित्त गोदान लेने हेतु विद्वान ब्राह्मण की आवश्यकता होती है जो इन विषयों से भिज्ञ हो, कोई भी प्रायश्चित्त गोदान नहीं ले सकता।

गोमूल्य दान विधि : यदि गोदान न कर सके तो गोमूल्य दान करे। गोमूल्य दान विधि इस प्रकार है।

  • तीन बार गोमूल्य की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ एतावत् द्रव्यमूल्यक सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम एतावत् द्रव्यमूल्योपकल्पितां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां रुद्रदैवतां यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् द्रव्यमूल्योपकल्पित सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

4. छत्रदान :

आद्यश्राद्ध में आसन उत्सर्ग करने के बाद छत्र और उपानद् दान किया जाता है जिसका अपात्रक में सिद्ध नहीं होता है अस्तु आरम्भ में ही करे :

  • सव्य पूर्वाभिमुख होकर छाता पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ छत्राय नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • छाते को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।

  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) आवरण काम इदं छत्रं उत्तानाङ्गिरो दैवतम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् छत्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

5. उपानद्दान :

  • सव्य पूर्वाभिमुख होकर उपानद् पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ उपानद्भ्यां नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • उपानद् को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।

  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) तप्त-बालुकासिकण्टकित-भूदुर्ग-सन्तरण काम इमे उपानहौ उत्तानाङ्गिरो दैवते यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् उपानद्दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

निःसंदेह इस प्रकार से दान करना अशास्त्रज्ञ स्वघोषित पंडितों को यह स्वीकारना दुष्कर है किन्तु विवेकवान विद्वद्जन गंभीरता से वास्तविकता को समझेंगे। अन्य वस्तुओं के दान विधि के लिये एक स्वतंत्र आलेख प्रकाशित किया गया है : दान विधि और मंत्र

दान

किसी भी कार्य में कालक्षेप कदापि न करे अर्थात द्विजदंपति पूजनोपरान्त वृषोत्सर्ग की व्यवस्था पूर्व से इस प्रकार हो कि अविलम्ब आरम्भ किया जा सके। पूर्वदिशा में वृषोत्सर्ग की व्यवस्था करें, वैतरणी के लिये दक्षिण दिशा में ४ हाथ लम्बी, २ हाथ चौड़ी और हस्तमात्र खात करे, उसमें इक्षुदण्ड की नौका दे। ब्रह्मा-होता आदि देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण (पुरोहित वर्ग) के ही होंगे, प्रेतसंबंधी ब्राह्मण नहीं। पुरोहितवर्ग के ब्राह्मण होने का तात्पर्य यह नहीं कि पुरोहित ही होंगे अपितु जो हवन विधि के ज्ञाता हों वो कर्मकांडी क्योंकि हवन भी कोई सामान्य कर्म नहीं है एवं इसका ज्ञान भी सबको नहीं होता है।

ब्रह्मा और भी अधिक विद्वान होने चाहिये, ब्रह्मा की योग्यता इतनी होनी चाहिये की वो संस्कृत (देववाणी) में ही वार्तालाप करें, हवन में कोई त्रुटि हो तो तुरंत निर्देश करें, किसी को कोई शंका वा प्रश्न हो तो उसका प्रामाणिक उत्तर दे सकें। यदि एक ही विद्वान ब्राह्मण उपलब्ध हों तो वही ब्रह्मा बनेंगे और वही होता भी अथवा ब्रह्मा के लिये दर्भबटु का प्रयोग किया जायेगा किन्तु होता से अल्पज्ञ ब्रह्मा नहीं हो सकते।

होता और ब्रह्मा के अतिरिक्त तन्त्रधार भी होंगे, सामान्यतः कर्मकांडी (श्राद्ध कराने वाले) ही तन्त्रधार भी बनते हैं किन्तु श्राद्ध कराने वाले को हवन विधि का ज्ञान हो ही यह आवश्यक नहीं है, वर्त्तमान में अधिकांशतः हवन विधि से अनभिज्ञ ही होते हैं।

हवन में उपयोगी पात्र स्रुवा, स्रुचि, प्रोक्षणी, प्रणीता, पूर्णपात्र, अग्निस्थापन स्थाली, आज्यस्थाली, चरुपाकपात्र, वृष हेतु पात्र आदि की व्यवस्था पूर्व ही करे। हवन के सभी द्रव्य शुद्ध होने चाहिये अर्थात शुद्ध घृत, शुद्ध और ग्राह्य गोदुग्ध आदि। वत्सरीचतुष्टय और निष्क्रय विषयक चर्चा पूर्वकृत है। होता और ब्रह्मा के लिए वरण सामग्री विशेष होता है अर्थात सामान्य वस्त्रादि के अतिरिक्त स्वर्णाभूषण (मुद्रिका मात्र) भी होना चाहिये। सर्वप्रथम संकल्प करे, यदि चार वत्सरी उपलब्ध न हो तो मूल्य कल्पित करे और संकल्प में ऊह करे –

संकल्प (पूर्वाभिमुख-सव्य, त्रिकुशा-तिल-जल लेकर संकल्प करे) – ॐ अद्याशौचान्तद्वितीयऽह्नि ……. गोत्रस्य पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतत्वविमुक्ति स्वर्गलोककामः सोपकरण (मूल्योपकल्पित) वत्सतरीचतुष्टयसहित जीववृषाभावे सोपकरण-पिष्टीमयवृषोत्सर्गमहं करिष्ये ॥

ब्रह्मा अपने निर्धारित आसन (हवन वेदी या भूमि के उत्तर भाग/वायव्य कोण में पूर्वाभिमुख) को ग्रहण करें अथवा कुशात्मक ब्रह्मा के पक्ष में तदनुसार व्यवस्था कर ले। यदि सद्यः ब्रह्मा हों तो उस विधि से अथवा कुशात्मक ब्रह्मा हों तो उस विधि से वरण करे। आगे दोनों विधि है :

ब्रह्मा वरण (बांये हाथ में ब्रह्मावरण सामग्री और दाहिने हाथ में त्रिकुशातिलजल लेकर ब्रह्मा वरण करे) : ॐ अद्य ……. गोत्रस्य पितुः ………. प्रेतस्य कर्तव्य पिष्टीमयवृषोत्सर्गाङ्गभूत होमकर्मणि कृताकृता वेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुं ……. गोत्रं …….. शर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूल- वस्त्रयुगहेमालङ्करणैर्ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ॥

  • वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् (ब्रह्मा का प्रतिवचन “वृतोऽस्मि”)

  • “ॐ यथाविहित कर्म कुरु” इति यजमानस्तमुद्दिश्य वदेत् । (यजमान कहे “ॐ यथाविहित कर्म कुरु”)

  • ॐ करवाणीति तत्प्रतिवचनम् । (ब्रह्मा का पुनः प्रतिवचन – “ॐ करवाणि”)

(कुशात्मक ब्रह्मा पक्ष में : ॐ अद्यास्मिन् होम कर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप कर्मकर्तुं त्वं मे ब्रह्मा भव॥ कुशात्मक ब्रह्मा में प्रतिवचन नहीं होता। )

होतृवरण (बांये हाथ में होतृवरण सामग्री और दाहिने हाथ में त्रिकुशातिलजल लेकर ब्रह्मा वरण करे) : ॐ अद्य ……. गोत्रस्य पितुः ……. प्रेतस्य कर्तव्य पिष्टीमयवृषोत्सर्गाङ्गभूत होमकर्म कर्तुं ……. गोत्रं …….. शर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूलहेमालङ्करणैश्च होतृत्वेन त्वामहं वृणे ॥

  • वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् (होता का प्रतिवचन “वृतोऽस्मि”)

  • “ॐ यथाविहित कर्म कुरु” इति यजमानस्तमुद्दिश्य वदेत् । (यजमान कहे “ॐ यथाविहित कर्म कुरु”)

  • ॐ करवाणीति तत्प्रतिवचनम् । (होता का पुनः प्रतिवचन – “ॐ करवाणि”)

यदि पृथक तन्त्रधार हों तो उनका भी वरण करे। तदनन्तर होता गोमय मंडल कृत हवन स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर पवित्रीकरण आदि करें। स्वस्तिवाचनादि किया जा सकता है किन्तु संक्षिप्त रूप से करें क्योंकि एकोद्दिष्ट भी उचित काल में हो यह आवश्यक है। मैथिलेत्तरों के विधान का इतना विस्तार है कि असंभव होता है किन्तु मैथिल विधान से संभव है। स्वस्तिवाचन का भी अधिक विस्तार करने से कालक्षेप ही होगा अस्तु संक्षिप ही करें यह आवश्यक है।

हवन विधि

हवन कर्म हवन विधि के अनुसार किया जायेगा केवल और संपूर्ण हवन होता ही करेंगे न कि श्राद्धकर्त्ता। वृषोत्सर्ग के हवन में किञ्चित अंतर ही होता है जैसे कि ब्रह्मा का वरण पूर्व ही हो जाता है। किञ्चित अंतर के अतिरिक्त अन्यान्य विधान हवन विधि के अनुसार ही संपन्न किया जायेगा।

  1. परिसमूह्य : ३ कुशाओं से स्थण्डिल या हस्तमात्र भूमि का परिसमूहन (सफाई) करें। कुशाओं को ईशानकोण में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे ।

  2. उल्लेपन : वेदी अथवा हस्तमात्र भूमि को गोबर से ३ बार लीपे।

  3. उल्लिख्य – स्फय या स्रुवमूल से प्रादेशमात्र पूर्वाग्र (दक्षिण से उत्तर क्रम में ६ – ६ अंगुल के अंतर इ) ३ रेखा उल्लिखित करे।

  4. उद्धृत्य – दक्षिणहस्त अनामिका व अंगुष्ठ से सभी रेखाओं से थोड़ा-थोड़ा मिट्टी लेकर ईशान में (अरत्निप्रमाण) त्याग करे ।

  5. अभ्युक्ष्य – हाथ में जल लेकर अधोमुखी हस्त वेदी पर छिड़के । ऊर्ध्वमुखी हस्त से प्रोक्षण होता है, तिर्यकहस्त से वोक्षण और अधोमुखी हस्त से अभ्युक्षण । ३ बार अभ्युक्षण करे।

  6. अग्नानयन व क्रव्यदांश त्याग – कांस्यपात्र में अन्य पात्र से ढंकी हुई अग्नि मंगाकर अग्निकोण में रखवाए ।

  7. अग्निस्थापन – दोनों हाथों से आत्माभिमुख अग्नि को चुपचाप स्थापित करे, अग्नानयन पात्र में अक्षत-जल छिरके।

  8. ब्रह्मावरण – पूर्वकृत है पुनरावृत्ति न करे। पूर्वकृत वरण के समय ही ब्रह्मा यथास्थान बैठें रहेंगे एवं आसन कल्पित करके ब्रह्मा को अग्नि के दक्षिण भाग में बिठाया जायेगा।

  9. बह्मा का आसन – दक्षिण दिशा (अग्निकोण) में, परिस्तरण भूमि को छोड़कर ब्रह्मा के लिये ३ कुश का आसान पूर्वाग्र बिछाये। प्रत्यक्ष ब्रह्मा का दक्षिणहस्त ग्रहण कर (कुशात्मक बह्मा को उठाकर) प्रदक्षिण क्रम से दक्षिण ब्रह्मासन तक ले जाकर स्वयं पूर्वाभिमुख होकर ब्रह्मा को उत्तराभिमुख बैठाये या कुशात्मक ब्रह्मा को स्थापित करे – ॐ अस्मिन् होम कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव॥ होता पुनः अप्रदक्षिणक्रम से अग्नि के पश्चिम भाग में आकर आसन पर बैठे।

  10. प्रणीय – तदनन्तर प्रणीतापात्र को आगे में रखकर जल भरे, कुशाओं से आच्छादन करे । फिर ब्रह्मा का मुखावलोकन करते हुए अग्नि के उत्तर भाग में विहित कुशाओं (२) के आसन पर रखे ।

  11. परिस्तरण – तदनन्तर १६ कुशा (उपमूललून बर्हि) लेकर परिस्तरण करे । ४ कुशा अग्निकोण से ईशानकोण तक उत्तराग्र (पूर्वभाग), ४ कुशा दक्षिण में ब्रह्मा से अग्नि पर्यंत पूर्वाग्र, ४ कुशा नैर्ऋत्यकोण से वायव्यकोण तक उत्तराग्र (पश्चिम भाग) और ४ कुशा उत्तर दिशा में अग्नि से प्रणीता तक पूर्वाग्र बिछाए । (परिस्तरण हेतु प्राकान्तर भी प्राप्त होता है : पूर्व में पूर्वाग्र, दक्षिण में उत्तराग्र, पश्चिम में पूर्वाग्र और उत्तर में पुनः उत्तराग्र।)

  12. आसादन : अग्नि के उत्तरभाग में पश्चिमपूर्व क्रम से क्रमशः आसादित करे : पवित्रीच्छेदन ३ कुशा, पवित्रिनिर्माण २ कुशा, प्रोक्षणी, आज्यस्थाली, घृत, चरुपाक पात्र, तण्डुल, दुग्ध, स्रुवा, स्रुचि, सम्मार्जन कुशा, उपयमन कुशा (वेणीरूपा), ३ समिधा (पलाश वा अन्य विहित), पिष्ट, पूर्णपात्र, पूर्णाहुति सामग्री, दक्षिणा (वृषोत्सर्ग हवन की)।

  13. पवित्री निर्माण – पवित्री निर्माण हेतु आसादित पवित्रिकरण २ कुशाओं को ग्रहण करे फिर मूल से प्रादेशप्रमाण भाग पर पवित्रच्छेदन ३ कुशाओं को रखकर दक्षिणावर्त २ बार परिभ्रमित करके नखों का प्रयोग किये बिना २ कुशों का मूल वाला प्रादेशप्रमाण भाग तोड़ ले शेष का उत्तर दिशा में त्याग करे। ग्रहण किये हुए प्रादेशप्रमाण २ कुशाओं से पवित्री बना ले । प्रोक्षणीपपात्र को प्रणिता के निकट रखे।

  14. पवित्रीहस्त प्रणीता से प्रोक्षणी में ३ बार जल देकर पवित्री को उत्तराग्र करके अंगूठा व अनामिका (दोनों हाथों से पकड़कर) से ३ बार प्रणीता का जल ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप (उत्पवन) करे।

  15. प्रोक्षणीपात्र को दांयें हाथ से उठाकर बांयें हाथ में रखे, दाहिने हाथ से अनामिका और अंगूठे द्वारा पवित्री ग्रहण किये हुए जल को ३ बार ऊपर उछाले। प्रणीतापात्र के जल से प्रोक्षणी को ३ बार सिक्त करके प्रोक्षणी के जल से होमार्थ आसादित-अनासादित सभी वस्तुओं को सिक्त करके दाहिने हाथ में लेकर अग्नि व प्रणीता के मध्य भाग में (२) कुशा के आसन पर प्रोक्षणीपात्र को रख दे।

  16. घृतपात्र को सामने रखकर उसमें में पवित्री रखकर घृत दे। पवित्री निकाल कर प्रोक्षणी पात्र में रख दे। चरु पाकपात्र में तण्डुल देकर प्रणीतोदक (मिश्रित) जल से ३ बार धोकर किञ्चित प्रणीतोदक और दुग्ध दे।

  17. घृतपात्र ब्रह्मा ले और चरुपात्र होता। दोनों ही घृतपात्र और चरुपात्र को प्रदक्षिणक्रम से घुमाते हुए अग्नि पर चढ़ाये, ब्रह्मा घृतपत्र दक्षिण भाग में रखे और उसके उत्तर होता चरुपात्र रखे ।

  18. दो प्रज्वलित तृण को प्रदक्षिणक्रम से घृत और चरुपात्र के ऊपर घुमाकर (घृत में सटाये बिना ऊपर घुमाकर) अग्नि में प्रक्षेप करे दे ।

  19. दाहिने हाथ से स्रुव लेकर ३ बार अग्नि पर तपाकर बांये हाथ में रखे, दाहिने हाथ से सम्मार्जन कुशा लेकर कुशाग्र से स्रुव के ऊपरी भाग का मूल से अग्रपर्यन्त सम्मार्जन करे और कुशमूल से स्रुव के पृष्ठभाग का अग्र से मूलपर्यन्त मार्जन करके प्रणीतोदक से स्रुवा को ३ बार सिक्त करके पुनः स्रुव को दाहिने हाथ में ले, पुनः ३ बार तपाकर दक्षिणभाग (अग्नि के पश्चिम भाग) में कुशा (आसन) के ऊपर रखे। इसी प्रकार स्रुचि को भी संस्कृत करके स्रुवा के उत्तर भाग में कुश के आसन पर रखे और सम्मार्जन कुशा का उत्तर भाग में त्याग करे।

  20. घृतपात्र को प्रदक्षिणक्रम में अग्नि से उतारकर प्रणीता के उत्तर भाग में रखे तदनन्तर पुनः सामने स्रुवा (स्रुचि) से उत्तर रखे । इसी प्रकार चरुपाक होने के पश्चात् चरु को भी अग्नि से उतारकर प्रणीता के उत्तर भाग में रखे पुनः सम्मुख आज्यपात्र से उत्तर रखे। प्रोक्षणी से पवित्री लेकर आज्योत्पवन करे अर्थात पूर्व की भांति से घृत को भी पवित्री से ३ बार ऊपर उछाले या मस्तक पर प्रक्षेप करे और पवित्री को प्रोक्षणी पात्र में रख दे।

  21. तत्पश्चात घृत को भलीभांति देखे, कुछ अपद्रव्यादि हो तो निकाल दे। पिष्ट (यदि अपूपादि हो तो वो भी) चरु के उत्तर भाग में रखे। पुनः पवित्री से प्रोक्षणी के जल को ३ बार ऊपर की पूर्ववत उछाले अर्थात उत्पवन करे।

  22. फिर बांये हाथ में उपयमन कुशा ग्रहण करके, उठकर (थोड़ा झुके हुये ३ घृताक्त समिधा जो तीन स्थानों पर घृताक्त भी हो; प्रजापति का ध्यानमात्र करते हुए अग्नि में प्रक्षेप करे।

  23. पर्युक्षण – फिर बैठकर पवित्रिहस्त होकर अर्थात प्रोक्षणी से पवित्री लेकर, प्रोक्षणी से जल लेकर सभी सामग्रियों, ब्रह्मा और प्रणीता सहित अग्नि का प्रदक्षिणक्रम से पर्युक्षण करे। ३ बार पर्युक्षण करके पवित्री को प्रणीतापात्र में रख दे।

  24. ब्रह्मा से कुशा द्वारा अनवारब्ध कर ले, पातितदक्षिणजानु होकर अगले ६ मंत्रों से संस्रव के बिना आज्याहुति प्रदान करे अर्थात आहुति देने के पश्चात् प्रोक्षणी में शेष का प्रक्षेप न करे :

ॐ इह रतिः स्वाहा, इदमग्नये ॥१॥

ॐ इह रमध्व ᳪ स्वाहा, इदमग्नये ॥२॥

ॐ इह धृतिः स्वाहा, इदमग्नये ॥३॥

ॐ इह स्वधृतिः स्वाहा, इदमग्नये ॥४॥

ॐ उपसृन्धरुणं मात्रे धरुणोमातरन्धयन्स्वाहा, इदमग्नये ॥५॥

ॐ रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा, इदमग्नये ॥६॥

अब संस्रवधारणपूर्वक चार आहुति दे अर्थात आहुति के पश्चात् शेष प्रोक्षणी में प्रक्षेप करे :-

  1. ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये। (मानसिक मात्र) प्रजापति का स्वाहाकार मंत्र बिना बोले आहुति दे, इदं प्रजापतये भी बिना बोले शेष प्रोक्षणीपात्र में प्रक्षेप करे। (अग्नि के दक्षिण भाग में पूर्व की ओर आगे)

  2. ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय। (अग्नि के उत्तर भाग में पूर्व की ओर आगे)

  3. ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये। (उत्तरपूर्वार्द्ध भाग में)

  4. ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय। (दक्षिणपूर्वार्द्ध भाग में)

अब स्रुचि में पिष्ट-पायस को (दक्षिण-उत्तर दो भागों में कल्पित करके दक्षिणार्द्ध भाग से) लेकर अग्नि में संस्रव के बिना दे। तत्पश्चात दक्षिणार्द्धभाग से चरु लेकर अगले मंत्रों से चरुहोम करे :

ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये ॥ ॐ रुद्राय स्वाहा, इदं रुद्राय ॥ ॐ शर्वाय स्वाहा, इदं शर्वाय ॥ ॐ पशुपतये स्वाहा, इदं पशुपतये ॥ ॐ उग्राय स्वाहा, इदमुग्राय॥ ॐ अशनये स्वाहा, इदमशनये ॥ ॐ भवाय स्वाहा, इदं भवाय ॥ ॐ महादेवाय स्वाहा, इदं महादेवाय ॥ ॐ ईशानाय स्वाहा, इदमीशानाय ॥

इसी प्रकार अब पिष्टि के दक्षिणार्द्ध भाग से स्रुचि में ग्रहण करके अगले मन्त्र से प्रदान करे :

ॐ पूषा गाऽअन्वेतु नः पूषा रक्षतु सर्वतः पूषावाज ᳪ सनोतु नः स्वाहा, इदं पूष्णे ॥

तत्पश्चात उत्तरभागार्द्ध से चरु और पिष्ट लेकर स्विष्टकृद्धोम करे :

स्विष्टकृद्धोम : ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदं अग्नयेस्विष्टकृते॥

अब संस्रवधारण पूर्वक आहुति प्रदान करे :

महाव्याहृति होम : ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥१॥ ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥२॥ ॐ स्वः स्वहा, इदं स्वः ॥३॥

सर्वप्रायश्चित्त होम :

  1. ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासि सीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाᳪसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा, इदमग्मीवरुणाभ्याम् ॥

  2. ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अवयक्ष्व नो वरुण ᳪ रराणो वीहि मृडीकᳪसुहवो न एधि स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥

  3. ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि । अया नो यज्ञᳪवहास्ययानो धेहि भेषज ᳪ स्वाहा, इदमग्नये॥

  4. ॐ ये ते शतँवरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा, इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः॥

  5. ॐ उदुत्तमँव्वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमᳪश्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा, इदं वरुणाय ॥

ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये॥ (मानसिक मात्र)

संसव प्राशन : प्रोक्षणी में प्रक्षिप्त आहुति अवशेष आज्याहुति का अनामिका और अंगुष्ठ से प्राशन करे, फिर २ आचमन करके प्रणीता से पवित्री लेकर उसकी गांठ खोलकर उससे सिर का मार्जन करके अग्नि में त्याग दे ।

प्रणीताविमोक : प्रणीता को अपने आगे अग्नि के पश्चिमभाग में रखकर पवित्री-उपयमन कुशादि धारणपूर्वक इस मंत्र द्वारा सिर को सिक्त करे – ॐ सुमित्रिया न आप ऽओषधयः सन्तु ॥ फिर इस मंत्र से प्रणीता को पश्चिम (नैर्ऋत्य) या ईशानकोण में न्युब्ज कर केवल जल गिराए, प्रणीता को पृथ्वी पर उल्टा न रखे केवल जल गिराकर सीधा ही रखे – ॐ दुम्मित्रियास्तस्म सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च व्व्वयन्द्विष्ष्म ॥

स्रुचि में सूखा वस्त्रावेष्टित घृताक्त नारियल या गरिगोला, पान, सुपारी, द्रव्यादि लेकर खड़ा होकर स्रुचि को दोनों हाथों से पकड़ते हुए प्रदान करे –

पूर्णाहुति मंत्र : ॐ मूर्द्धानन्दिवो ऽअरतिम्पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽआजातमग्निम् ॥ कवि ᳪ सम्म्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रञ्जनयन्त देवाः स्वाहा ॥

बर्हिहोम : परिस्तरण वाले कुशाओं को उठाकर मोड़ते हुए छोटा गट्ठर (पुल्ली) बनाकर घृताक्त करके इस मंत्र से अग्नि में त्याग करे – ॐ देवा गातु विदो गातु वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञ स्वाहा वातेधाः स्वाहा ॥

ब्रह्मा दक्षिणा (पूर्णपात्र – यजमान करे) : ॐ अद्य कर्तव्य पिष्टीमयवृषोत्सर्गाङ्गभूत होमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापति दैवतम् यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणामहं ददे ॥ ब्रह्मा को पूर्णपात्र प्रदान करे, । फिर दाहिना हाथ पकरकर ब्रह्मा को प्रदक्षिणक्रम से उठाए ।

(यदि कुशात्मक ब्रह्मा हों तो यह मंत्र पढे – ॐ अद्य कर्तव्य पिष्टीमयवृषोत्सर्गाङ्गभूत होमकर्मणि कृताऽकृताऽवेक्षणरूप ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतं ब्रह्मणे दक्षिणा नमः ॥ पूर्णपात्र दक्षिणा देकर कुशात्मक ब्रह्मा की ग्रंथि खोल दे)

होतृ दक्षिणा (यजमान करे) : ॐ अद्य कर्तव्य पिष्टीमयवृषोत्सर्गाङ्गभूत कृतैतत् होमकर्म प्रतिष्ठार्थं एतानि वस्त्रयुगसुवर्णकांस्यानि बृहस्पतिवह्निचन्द्रदैवत्यानि यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय होत्रे दक्षिणां अहं ददे॥ तदनन्तर रुद्राध्याय जप वा श्रवण करे।

रुद्राध्याय

ॐ नमस्ते रुद्द्र मन्न्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः । बाहुब्भ्यामुत ते नमः ॥१॥ या ते रुद्द्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी । तयानस्तन्न्वाशन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥२॥ यामिषुङ्गिरिशन्तहस्ते बिभर्ष्ष्यस्तवे । शिवाङ्गिरित्रताङ्कुरुमा हि ᳪ सीः पुरुषञ्जगत् ॥३॥ शिवेनव्वचसात्त्वागिरिशाच्छाव्वदामसि । यथा नः सर्व्वमिज्जगदयक्ष्म ᳪ सुमनाऽअसत् ॥४॥ अद्धयवोचदधिवक्क्ताप्प्रथमो- दैव्व्योभिषक्। अहीँश्च्च सर्व्वाञ्जभयन्त्सर्व्वाश्च्चयातुधान्न्योऽधराचीः परासुव॥५॥ असौयस्ताम्म्रोऽअरुणऽउतबब्भ्रुः सुमङ्गलः । ये चैन ᳪ रुद्द्राऽअभितोदिक्षुश्रिताः सहस्रशोऽवैषा ᳪ हेडऽईमहे ॥६॥ असौ योऽवसर्प्पति नीलग्ग्रीवो व्विलोहितः। उतैङ्गोपाऽअदृश्श्रन्नदृश्श्रन्नुदहार्य्यः सदृष्टो मृडयातिनः ॥७॥ नमोऽस्तु नीलग्ग्रीवाय सहस्राक्षायमीढुषे। अथोये ऽअस्य सत्त्वानोऽहन्तेब्भ्योऽकरन्नमः ॥८॥ प्प्रमुञ्चधन्न्वनस्त्वमुभयोरार्त्क्ज्याम्। याश्च्च तेहस्तऽइषवः पराता भगवोव्वप ॥९॥ व्विज्ज्यन्धनुः कपर्द्दिनो व्विशल्ल्यो बाणवाँ२ ऽउत। अनेशन्नस्ययाऽइषव ऽआभुरस्यनिषङ्गधिः ॥१०॥ याते हेतिर्म्मीढुष्ट्टमहस्ते बभूव ते धनुः। तयास्म्मान्निवश्श्वतस्त्वमयक्ष्म्मया परिभुज ॥११॥ परि ते धन्न्वनोहेतिरस्म्मान्न्व्वृणक्तु व्विश्श्वतः। अथोयऽइषुधिस्तवारे-ऽअस्म्मन्निधेहितम् ॥१२॥ अवतत्त्य धनुष्ट्व ᳪ सहस्राक्षशतेषुधे। निशीर्य्यशल्ल्यानाम्मुखा शिवोनः सुमना भव ॥१३॥ नमस्त ऽआयुधायानातताय धृष्ष्णवे। उभाब्भ्यामुतते नमो बाहुब्भ्यान्तव धन्न्वने ॥१४ मानोमहान्तमुतमानोऽअर्ब्भकम्मानऽउक्षन्तमुतमानऽउक्षितम् । मानोव्वधीः पितरम्मोतमातरम्मानः प्प्रियास्तन्न्वो रुद्द्ररीरिषः ॥१५॥ मानस्तोकेतनये मानऽआयुषिमानो गोषुमानोऽअश्वेषुरीरिषः। मानोव्वीरान्न्रुद्द्रभामिनोव्वधीर्हविष्म्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥१६॥ नमोहिरण्ण्यबाहवे सेनान्न्ये दिशाञ्चपतये नमोनमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यः पशूनाम्पतये नमोनमः शष्प्पिञ्जरायत्त्विषीमते पथीनाम्पतये नमोनमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्ट्टानाम्पतये नमोनमो बब्भ्लुशाय ॥१७॥ नमो बब्भ्लुशाय व्व्याधिनेऽन्नानांपतये नमोनमो भवस्यहेत्यै जगताम्पतये नमोनमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणाम्पतये नमोनमः सूतायाहन्त्यै व्वनानाम्पतये नमोनमो रोहिताय ॥१८॥ नमो रोहितायस्थपतये व्वृक्षाणाम्पतये नमोनमो भुवन्तये व्वारिवस्कृतायौषधीनाम्पतये नमोनमो मन्त्रिणे व्वाणिजायकक्षाणाम्पतये नमोनमऽउच्चैर्घोषाया क्क्रन्दयते पत्तीनाम्पतये नमोनमः कृत्स्नायतया ॥१९॥ नमः कृत्स्नायतया धावते सत्त्वनाम्पतये नमोनमः सहमानायनिव्व्याधिन ऽआव्व्याधिनीनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणे ककुभायस्तेनानाम्पतये नमोनमो निचेरवे परिचरायारण्ण्यानाम्पतये नमोनमो वञ्चते ॥२०॥ नमो वञ्चते परिवञ्चतेस्तायूनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणऽइषुधिमते तस्क्कराणाम्पतये नमोनमः सृकायिब्भ्यो जिघा ᳪ सद्ब्भ्योमुष्णताम्पतये नमोनमो ऽसिमद्ब्भ्योनक्क्तञ्चरद्ब्भ्यो व्विकृन्तानाम्पतये नमः ॥२१॥ नमऽउष्ष्णीषिणे गिरिचराय कुलुञ्चानाम्पतये नमोनम ऽइषुमद्ब्भ्यो धन्न्वायिब्भ्यश्च वो नमोनमऽआतन्न्वानेब्भ्यः प्रतिदधानेब्भ्यश्च वोनमोनमऽआयच्छद्ब्भ्योऽस्यद्ब्भ्यश्चवो नमोनमो व्विसृजद्ब्भ्यः॥२२॥ नमो व्विसृजद्ब्भ्यो व्विद्धयद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः स्वपद्ब्भ्यो जाग्रद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः शयानेब्भ्यऽआसीनेब्भ्यश्च वो नमोनमस्तिष्ठद्ब्भ्यो धावद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः सभाब्भ्यः ॥२३॥ नमः सभाब्भ्यः सभापतिब्भ्यश्च वो नमोनमो ऽश्वेब्भ्यो ऽश्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनम ऽआव्व्याधिनीब्भ्यो व्विविद्धयन्तीब्भ्यश्च वो नमोनम उगणाब्भ्यस्तृ ᳪ हतीब्भ्यश्च वो नमोनमो गणेब्भ्यः ॥२४॥ नमो गणेब्भ्यो गणपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्व्रातेब्भ्यो व्व्रातपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो गृत्सेब्भ्यो गृत्सपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्विरूपेब्भ्यो व्विश्वरुपेब्भ्यश्च वो नमोनमः सेनाब्भ्यः ॥२५॥ नमः सेनाब्भ्यः सेनानिब्भ्यश्च वो नमोनमो रथिब्भ्यो ऽअरथेब्भ्यश्च वो नमोनमः क्षत्तृब्भ्यः संग्रहीतृब्भ्यश्च वो नमोनमो महद्ब्भ्यो ऽअर्ब्भकेब्भ्यश्च्च वो नमः ॥२६॥ नमस्तक्षब्भ्यो रथकारेब्भ्यश्च वो नमोनमः कुलालेब्भ्यः कर्म्मारेब्भ्यश्च वो नमोनमो निषादेब्भ्यः पुञ्जिष्ट्ठेब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वनिब्भ्योमृगयुब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वब्भ्यः ॥२७॥ नमः श्वब्भ्यः श्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्व्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नमः कपर्द्दिने ॥२८॥ नमः कपर्द्दिने च व्व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्न्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्ट्टाय च नमो मीढुष्ट्टमाय चेषुमते च नमो ह्रस्वाय ॥२९॥ नमो ह्रस्वाय च व्वामनाय च नमो बृहते च व्वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमोऽग्ग्र्याय च प्रथमाय च नम ऽआशवे ॥३०॥ नमऽआशवे चाजिराजाय च नमः शीग्घ्र्याय च शीब्भ्याय च नमऽऊर्म्म्याय चावस्वन्न्याय च नमो नादेयाय च द्द्वीप्प्याय च ॥३१॥ नमो जयेष्ठ्ठाय च कनिष्ठ्ठाय च नमः पूर्व्वजाय चापरजाय च नमो मद्ध्यमाय चापगल्ब्भाय च नमो जघन्न्याय च बुध्न्याय च नमः सोब्भ्याय ॥३२॥ नमः सोब्भ्याय च प्रतिसर्य्याय च नमो याम्म्याय च क्षेम्म्याय च नमः श्लोक्क्याय चावसान्न्याय च नम उर्व्वर्याय च खल्ल्याय च नमो व्वन्न्याय ॥३३॥ नमो व्वन्न्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्प्रतिश्रवाय च नम आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चावभेदिने च नमो बिल्मिने ॥३४॥ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो व्वर्मिणे च व्वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुब्भ्याय चाहनन्न्याय च नमो धृष्ष्णवे ॥३५॥ नमो धृष्ष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्ष्णेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च ॥३६॥ नमः स्रुत्याय च पथ्याय च नमः काट्टयाय च नीप्प्याय च नमः कुल्ल्याय च सरस्याय च नमो नादेयाय च व्वैशन्ताय च नमः कूप्प्याय ॥३७॥ नमः कूप्प्याय चावट्टयाय च नमो व्वीद्ध्र्याय चातप्प्याय च नमो मेग्घ्याय च व्विद्द्युत्याय च नमो व्वर्ष्ष्याय चाव्वर्ष्ष्याय च नमो व्वात्त्याय ॥३८॥ नमो व्वात्त्याय च रेष्म्म्याय च नमो व्वास्तव्व्याय च व्वास्तुपाय च नमः सोमाय च रुद्राय च नमस्ताम्राय चारुणाय च नमः शङ्गवे ॥३९॥ नमः शङ्गवे च पशुपतये च नमऽउग्ग्राय च भीमाय च नमो ऽग्ग्रेव्वधाय च दूरेव्वधाय च नमो हन्त्रे च हनीयसे च नमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यो नमस्ताराय ॥४०॥ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्क्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥४१॥ नमः पार्य्याय चावार्य्याय च नमः प्प्रत्तरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्त्थ्याय च कूल्ल्याय च नमः शष्प्याय च फ़ेन्न्याय च नमः सिकत्त्याय ॥४२॥ नमः सिकत्त्याय च प्प्रवाह्य्याय च नमः कि ᳪ शिलाय च क्षयणाय च नमः कपर्द्दिने च पुलस्तये च नम ऽइरिण्ण्याय च प्प्रपत्थ्याय च नमो व्व्रज्ज्याय ॥४३॥ नमो व्व्रज्ज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्प्याय च गेह्य्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्प्याय च नमः काट्टयाय च गह्वरेष्ठ्ठाय च नमः शुष्क्क्याय ॥४४॥ नमः शुष्क्क्याय च हरित्याय च नमः पा ᳪ सव्व्याय च रजस्याय च नमो लोप्प्याय चोलप्प्याय च नमऽउर्व्व्याय च सूर्व्व्याय नमः पर्ण्णाय ॥४५॥ नमः पर्ण्णाय च पर्ण्णशदाय च नमऽउद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नमऽआखिदते च प्प्रखिदते च नमऽइषुकृद्ब्भ्यो धनुष्कृद्ब्भयश्च वो नमोनमो वः किरिकेब्भ्यो देवाना ᳪ हृदयेब्भ्यो नमो व्विचिन्न्वत्केब्भ्योनमो व्विक्षिणत्केब्भ्यो नमऽआनिर्हतेब्भ्यः ॥४६॥ द्द्रापेऽअन्धसस्प्पतेदरिद्द्रनीललोहित । आसाम्प्रजानामेषाम्पशूनाम्माभेर्म्मारोङ्मोचनः किञ्चनाममत् ॥४७॥ इमारुद्द्रायतवसे कपर्द्दिने क्षयद्वीराय प्प्रभरामहेमतीः । यथाषमसद्द्विपदे चतुष्ष्पदे व्विश्व्म्पुष्टङ्ग्रामेऽअस्म्मिन्ननातुरम् ॥४८॥ याते रुद्द्र शिवा तनूः शिवा व्विश्वाहाभेषजी । शिवारुतस्य भेषजी तयानो मृडजीवसे ॥४९॥ परिनोरुद्द्रस्य हेतिर्व्वृणक्क्तु परित्वेषस्य दुर्मतिरघायोः। अवस्त्थिरामघवद्ब्भ्यस्तनुष्ष्वमीड्ढवस्तोकाय तनयाय मृड ॥५०॥ मीढुष्ट्टमशिवतमशिवो नः सुमना भव। परमे व्वृक्षऽआयुधन्निधाय कृत्तिंव्वसानऽआचरपिनाकम्बिब्भ्रदागहि ॥५१॥ व्विकिरिद्द्रव्विलोहित नमस्तेऽअस्तुभगवः। यास्ते सहस्र ᳪ हेतयोऽन्न्यमस्म्मन्निव पन्तुताः ॥५२॥ सहस्राणि सहस्रशोबाह्वोस्तव हेतयः। तासामीशानो भगवः पराचीनामुखाकृधि ॥५३॥ असङ्ख्याता सहस्राणि ये रुद्द्राऽअधिभूम्म्याम्। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५४॥ अस्म्मिन्न्महत्त्यर्ण्णवेऽन्तरिक्षे भवाऽअधि। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५५॥ नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठा दिव ᳪ रुद्द्राऽउपश्श्रिताः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५६॥ नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्व्वाऽअधः क्षमाचराः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५७॥ ये व्वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्ग्रीवा व्विलोहिताः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५८॥ ये भूतानामधिपतयो व्विशिखासः कपर्द्दिनः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५९॥ ये पथाम्पथि रक्षयऽऐलबृदाऽआयुर्य्युधः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६०॥ ये तीर्त्थानि प्प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६१॥ येन्नेषु व्विविद्ध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान्। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६२॥ यऽएतावन्तश्च्च भूया ᳪ सश्च्च दिशो रुद्द्रा व्वितस्त्थिरे। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६३॥ नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये दिवि येषाम्व्वातऽइषवः। तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दश दक्षिणादशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः। तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६४॥ नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो येऽन्तरिक्षे येषाम्व्वर्षमिषवः। तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः। तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६५॥ नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये पृथिव्यां येषामन्न मिषवः। तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः। तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनो ऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६६॥

रुद्राध्याय जप करके पिष्टी आदि से वृष निर्मित करे यहां यह अनिवार्य न समझा जाय कि यजमान ही करे अर्थात यदि यजमान से विशेष लक्षणादि घटित होना संभव न हो तो अन्य योग्य व्यक्ति (जो शुद्ध हो) द्वारा भी निर्मित किया जा सकता है। उपरोक्त यदि अन्य व्यक्ति से निर्माण कराया जाय तो पूर्व में है करा ले, यदि यजमान सक्षम हो तो यहां स्वयं करे। “हेमाद्रि – दान काण्ड” और “चतुर्वर्गचिन्तामणि – दानखण्ड” में भी ऐसा एक वचन दृष्ट है – “शालिचूर्णेन वा कृत्वा गोवृषं लक्षणान्वितम्। तस्यैव पूजयेद् देवं रुद्रं सर्वेश्वरं विभुम्॥” अर्थात जीववृष के अभाव में पिष्टी आदि का वृष बनाये तो उसमें रुद्र का पूजन भी करे, अस्तु यहां रुद्र का आवाहन करके पूजन भी करे। पूजन संक्षेप में ही करे :

  • ॐ रुद्र इहागच्छ इहतिष्ठ ॥

  • एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयपुनराचमनीयानि ॐ रुद्राय नमः ॥

  • इदं अनुलेपनं ॐ रुद्राय नमः ॥

  • इदं पुष्पं ॐ रुद्राय नमः ॥

  • इदं अक्षतं ॐ रुद्राय नमः ॥

  • इदं बिल्वपत्रं ॐ रुद्राय नमः ॥

  • एतानि गन्धपुष्पधूपदीपताम्बूलनैवेद्यानि ॐ रुद्राय नमः ॥

  • आचमनीयं पुनराचमनीयं ॐ रुद्राय नमः ॥

  • एष पुष्पांजलिः ॐ रुद्राय नमः ॥

तदनन्तर वृष को चिह्नांकित किया जायेगा यहां न ही लौह तपाने की आवश्यकता होगी और न ही कर्मकार की। रक्तचन्दन से वृष के अग्रिम दक्षिणपादपार्श्व में चक्र तथा पश्चिम (पिछले) वामपादपार्श्व में त्रिशूल का चिन्ह अंकित करे। अंकन करने के उपरांत चारों वत्सरी सहित वृष को कुशोदक से स्नान कराये अथवा किसी पात्र में जल लेकर अगले मंत्रों से कुश द्वारा प्रोक्षित करे :

तत्र स्नानकरणमन्त्राः ॐ हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः कश्यपो यास्विन्द्रः। याऽअग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्तानऽआपः श ᳪ स्योनाभवन्तु ॥ ॐ यासा ᳪ राजा वरुणो याति मध्ये सत्त्यानृतेऽअवपश्यञ्जनानाम्। याऽअग्निङ्गर्भं दधिरे सुवर्णास्तानऽआपः श ᳪ स्योनाभवन्तु ॥ ॐ यासान्देवा दिवि कृण्वन्ति भक्ष्यं याऽन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति । याऽअग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्तानऽआपः श ᳪ स्योना भवन्तु ॥ ॐ शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्नोपस्पृशत त्वचं मे। धृतश्चुतः शुचयो याः पावकास्तानऽआपः श स्योनाभवन्तु ॥ ॐ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्रवन्तु नः ॥

तत्पश्चात घण्टी, नूपुर, कनकपट्ट आदि से वृष और वत्सरी पांचों को अलंकृत करके सावित्री जप करे, पुनः अघमर्षण जप करे :

विनियोग : अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृतो देवताश्वमेधाऽवभृथे विनियोगः ।

ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततोरात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः ॥
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधाविश्वस्य मिषतो वशी॥
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः॥

तदनन्तर पुनः रुद्राध्याय जप करके पुरुषसूक्त जपे :

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि ᳪ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥ पुरुष ऽएवेद ᳪ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥ त्रिपादूर्ध्व ऽउदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने ऽअभि ॥४॥ ततो विराडजायत विराजो ऽअधि पूरुषः । स जातो ऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥६॥ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऽऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दा ᳪ सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥ तस्मादश्वा ऽअजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता ऽअजावयः ॥८॥ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा ऽअयजन्त साध्या ऽऋषयश्च ये ॥९॥ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्यासीत्किम्बाहू किमूरू पादा ऽउच्येते ॥१०॥ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्या ᳪ शूद्रो ऽअजायत ॥११॥ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो ऽअजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२॥ नाभ्या ऽआसीदन्तरिक्ष ᳪ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ२ऽकल्पयन् ॥१३॥ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽइध्मः शरद्धविः ॥१४॥ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥

तदनन्तर कुष्माण्डी जप करे :

ॐ यद्देवा देवहेडनं देवासश्च कृमा वयम् । अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ᳪ हसः ॥१॥ ॐ यदि दिवा यदि नक्तमेना ᳪ सि च कृमा वयम् ॥ वायुर्मा तस्मादेनसो व्विश्वान्मुञ्चत्व ᳪ हसः ॥२॥ ॐ यदि जाग्रद्यदि स्वप्न ऽएना ᳪ सि च कृमा वयम् ॥ सूर्यो मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व ᳪ हसः ॥३॥

वृष के दक्षिणकर्ण में जपे : ॐ पिता वत्सानां पतिरघ्न्यानामथो पिता महता गर्गराणाम् । वत्सोजरायुः प्रतिधुक् पीयूषऽ आमिक्षा घृतं तद्वदस्ये रेतः ॥१॥ ॐ वृषो हि भगवान्धर्मश्चतुष्पादः प्रकीर्तितः । वृणोमि तमहं भक्त्या स मां रक्षतु सर्वतः ॥२॥

कुशत्रयतिलजल लेकर उत्सर्ग करे : ॐ अद्याशौचान्तद्वितीयेऽह्नि …… गोत्रस्य पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतलोकविमुक्ति- स्वर्गलोकप्राप्तिकामः रुद्रदैवतं पिष्टीमयविकल्पितं वृषभमेतं युवानं पतिं वो ददानि तेन क्रीडन्तीश्चरथ प्रियेण । मानः साप्त्यजनुषा सुभगा रायस्पोषेण समिषा मदेम ॥ इस प्रकार उत्सर्ग करके पांचों को पूर्व से ईशानकोण (की ओर) ले जाकर पूजन करे :

एषोऽर्घः ॐ सोपकरणवत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥ इदमनुलेपनम् ॐ सोपकरण वत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥ इदमक्षतं ॐ सोपकरणवत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥ इदं पुष्पं ॐ सोपकरणवत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥ एत्तानि गन्ध पुष्प धूपदीपनैवेद्य ताम्बूलानि ॐ सोपकरणवत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥ पुष्पांजलिः ॐ सोपकरणवत्सतरीचतुष्टयसहिताय वृषभाय नमः॥

तदनन्तर वत्सरीचतुष्टय के मध्य में स्थित वृष को अनामिका से स्पर्श करके अगले मन्त्र से अभिमंत्रित करे : ॐ समुद्रोऽसि नभस्वानार्द्रदानुशम्भूर्मयोभूरभि माव्वाहि स्वाहा ॥ मारुतोऽसि मरुतां गणः शम्भूर्मयोभूरभि माव्वाहि स्वाहा। अवस्यूरसि दुवस्वाञ्छम्भूर्मयोभूरभि माव्वाहि स्वाहा ॥ ॐ यास्तेऽअग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः। ताभिर्न्नोऽअद्यसर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि॥ ॐ या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः । इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचन्नो धत्त बृहस्पते ॥ ॐ रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुच ᳪ राजसु नस्कृधि। रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचारुचम् ॥ ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोध्धुरुश ᳪ स मान ऽआयुः प्रमोषीः ॥ ॐ स्वर्णः धर्मः स्वाहा ॐस्वर्णार्क्कः स्वाहा ॐ स्वर्णशुक्रः स्वाहा ॐ स्वर्णज्योतिः स्वाहा ॐ स्वर्णसूर्य्यः स्वाहा ॥

तदुत्तर वृषभपुच्छोदक से तीन बार तर्पण कहा गया है, पिष्ट वृषभ में समस्या होने से किसी ताम्रपात्र में जल लेकर उसका पिष्टवृषभ के पुच्छ से स्पर्श करा ले एवं उसमें तिल-यव दे दे। अपसव्य-दक्षिणाभिमुख पातितवामजानु-मोटकहस्त होकर दक्षिणाग्र त्रिकुशा पर मन्त्रस्थ उद्देश्य का चिंतन करते हुये तर्पण करे :

ॐ स्वधा पितृभ्यो मातृभ्यो बन्धुभ्यश्चापि तृप्तये । मातृपक्षाश्च ये केचिद्ये चान्ये पितृपक्षजाः ॥

गुरुश्वशुरबन्धूनां ये कुलेषु समुद्भवाः । ये प्रेतभावमापन्ना ये चान्ये श्राद्धवर्जिताः ॥

वृषोत्सर्गेण ते सर्वे लभन्तां प्रीतियुत्तमाम् ॥

इस मन्त्र को ३ बार पढ़ते हुये ३ अञ्जलि जल प्रदान करे। तदनन्तर यदि वृषनिर्माण हेतु अन्य कर्मकार हो तो उसे उचित मूल्य प्रदान करे। तदुपरांत ब्राह्मणों के समक्ष घोषित करे :

यत्किचिद्विजने मयोत्सृष्टं तदन्यो न नयेत् न वाह्यं न चैतत्क्षीरं पातव्यं केनचित्किचित्कचित्॥

रुद्राग्निबहुसर्पिष्कं पायसं ब्राह्मणान्भोजयेत् – आगे ब्राह्मण भोजन में पायस का ही उल्लेख प्राप्त होता है और उल्लिखित होने से ब्रह्मा-होता हेतु पायस ही विहित होगा। किन्तु यदि देव-पितृ वर्ग के ब्राह्मण ब्रह्मा होता हों तो पाचक भी ब्राह्मण ही हों यह आवश्यक है और पूर्व में चर्चा कर दी गयी है। इसके पश्चात् गोदान करे और यहीं पर यह सिद्ध होता है कि गोदान इसी काल में किया जायेगा न कि एकोद्दिष्ट दक्षिणा काल में। वास्तव में यह वैतरणी गोदान है और श्राद्ध के आरम्भ में ही यथाक्रम करना उचित है और विधि यथावत रहे अर्थात वृषोत्सर्ग हो तो भी और न हो तो भी गोदान की विधि यथावत ही हो। दक्षिण भाग में गोदान करे ।

वृषोत्सर्ग

श्राद्ध में भोजन के अन्न का उष्ण होना आवश्यक कहा गया है और यह तभी संभव है जब पाक होने के उपरांत एकोद्दिष्ट आरम्भ कर दिया जाय इसके लिये यह आवश्यक हो जाता है कि पाचक (पाककर्ता) भी अवश्य ही हो अन्यथा उचितकाल में श्राद्ध होना संदिग्ध रहेगा। यदि न हो तो कर्त्ता प्रथम दान करे तदुपरांत पाक करके एकोद्दिष्ट करे। यदि पाचक हो तो नित्यकर्म के पश्चात् जबतक कर्त्ता दान करेगा तब तक पाचक पाक करेगा। पञ्चगव्य निर्माण, प्राशन, प्रोक्षण आदि भी करे।

मौशल स्नान, स्नानादि विषयक चर्चा पूर्वकृत है। ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण, शिखाग्रंथि, पवित्रीकरण, सूर्यार्घ्य दान, गायत्री जप, तर्पण व तिलांजलि, पंचदेवता-विष्णुपूजन, अंगारभ्रमण, गौरमृत्तिका आच्छादन, रक्षादीप प्रज्वलन, दिग्बन्धन आदि करके आगे की यथाव्यवस्था क्रिया आरम्भ करे।

दिग्रक्षण मंत्र : ॐ नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरूषोत्तम । इदं श्राद्धं हृषीकेश रक्ष त्वं सर्वतो दिशः ॥

वरण (महापात्र) : ॐ अद्य गोत्रस्य ……….. पितुः …………. प्रेतस्य प्रेतत्व विमुक्ति हेतु कर्तव्य अपात्रक षोडश/सप्तदश श्राद्धे साक्षी ब्राह्मण कर्म कर्तुं एभिः वरणीय वस्त्रादि वस्तुभिः ब्राह्मणत्वेन त्वामहं वृणे॥

महापात्र के अतिरिक्त एकादशाह को अन्य किसी भी ब्राह्मण का वरण नहीं होना चाहिये यह स्पष्ट किया जा चुका है। तदनन्तर वर्णित महापात्र केवल साक्षी रूप में उपस्थित हैं ऐसा भाव ही रखना चाहिये। दान में महापात्र के पैर की पूजा करने के स्थान पर त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) का ही प्रयोग करना उचित होता है अन्यथा अपात्रकत्व बाधित होता है।

सूतकान्ताद्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्॥

काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्विताम्। संपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः॥

वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा। उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः॥

मत्स्यपुराण/१८/१२ – १४

आरम्भ

1 – शय्यादान विधि

  • शय्या पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छींटे : ॐ सोपकरणशय्यायै नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • शय्या को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।

  • पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) पर दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां सोपकरणां शय्यां विष्णु दैवताम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत्सोपकरण शय्यादान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

2 – काञ्चनपुरुषदान विधि

काञ्चनपुरुष दान में सावधानी : प्रायः काञ्चनपुरुष में टीन, लोहा आदि का टुकड़ा ही दान किया जाता है जो सर्वथा अनुचित है। इसमें कराने वाले कर्मकांडी और यजमान दोनों ही असत्यसंभाषण दोष से युक्त होते हैं। काञ्चनपुरुष स्वर्ण के ही हों यह अनिवार्य है। दरिद्र हेतु विकल्प तो है ही जैसे गोनिष्क्रय (मूल्य) दान किया जाता है उसी प्रकार अभाव में द्रव्यमूल्योपकल्पित काञ्चनपुरुषाय नमः भी प्रयोग किया जा सकता है एवं इसमें दोष नहीं होगा।

  • काञ्चनपुरुष पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुषाय नमः ॥३॥

  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

  • काञ्चनपुरुष को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।

  • पुनः तिल, जल, त्रिकुशा (उत्सर्ग) : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इदं फलवस्त्र समन्वितकाञ्चनपुरुषं विष्णु दैवतम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुष दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

द्विजदम्पति पूजन

द्विजदंपति पूजन के विषय में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि इसका तात्पर्य सपात्रक होना नहीं है और ये पूज्याधिकार के अंतर्गत आता है एवं पूज्यत्व स्थिर ही रहेगा, भले ही पात्रात्वाभाव ही क्यों न सिद्ध हो रहा हो।

सूतकान्ताद्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद्विलक्षणाम्। काञ्चनं पुरुषं तद्वत्फलवस्त्रसमन्विताम्॥

संपूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः। वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा॥

मत्स्यपुराण/१८/१२ – १४

एकादशाह के दिन यदि क्रियाओं का क्रम देखें तो प्रामाणिक रूप से शय्यादान, काञ्चनपुरुषदान (फलवस्त्र सहित), द्विजदंपति पूजन, वृषोत्सर्ग, कपिलागोदान इस क्रम से प्राप्त होता है। इस क्रम के अनुसार वृषोत्सर्ग से पूर्व द्विजदंपत्ती होना चाहिये। इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को भी समझ लेना आवश्यक है :

  1. सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि श्राद्ध (एकोद्दिष्ट) भी उचित काल में कम-से-कम आरम्भ हो जाये इसके लिये एक विशेषज्ञ निर्देशक (विद्वान ब्राह्मण) की आवश्यकता होती है।

  2. पूजन में उस द्विज का चयन करना चाहिये जो अन्य सामान्य दिनों में भी ब्राह्मण के जैसे दिखते हो (वेष-भूषा आदि) से। यदि सामान्य दिनों में भी म्लेच्छ वेष-भूषा धारण करते हैं, तो अग्राह्य। यह न्यूनतम अर्हता तो स्वीकार करनी ही होगी अन्यथा यहां भी विकल्प ही ढूंढा जायेगा और कम-से-कम पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण तो दिखते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है कि द्विजदंपति पूजन में ऐसे महापात्र का ही पूजन होगा जो पूर्णतः म्लेच्छाचारी हो। शिखा-तिलक आदि द्रष्टव्य होते हैं और ये सामान्य दिनों में भी दिखने चाहिये।

  3. पूजन में नियुक्त होने वाले ब्राह्मण के क्षौरादि की व्यवस्था यजमान करे और उसी दिन क्षौरकर्म किया जायेगा एवं यहां द्विज में क्षौर संबंधी किसी दोष की मान्यता नहीं होगी।

  4. दान (शय्या-काञ्चनपुरुष) आरम्भ होने से पूर्व ही द्विजदंपति को भी श्राद्धस्थला में बुला ले क्योंकि श्राद्ध में विलम्ब होना करना दोनों ही दोषद है, जो यथा समय उपस्थित न हो सकें वो आमंत्रण ही अस्वीकार कर दें और आमंत्रण स्वीकार करने वाले के लिये यह आवश्यक होता है कि उनके कारण श्राद्ध में किसी भी प्रकार का विलम्ब न हो। केवल भोजन में छूट है कि भरपेट भोजन करें भले ही आधा घंटा क्यों न लगे क्योंकि वहीं मुख्य कार्य है किन्तु भोजन के लिये भी उपस्थित होने में विलम्ब न करें ऐसा ही नियम है।

  5. उत्तर भाग में, ब्राह्मण सवामांगी उत्तराभिमुख हों यजमान पूर्वाभिमुख और यदि ब्राह्मण पूर्वाभिमुख हों तो यजमान उत्तराभिमुख रहे। ब्राह्मण का पूर्वाभिमुख होना अधिक प्रशस्त है। बैठने के लिये उच्च आसनादि की व्यवस्था होनी चाहिये।

संक्षिप्त प्रयोग

सर्वप्रथम पूर्वाभिमुख होकर त्रिकुशा-तिल-जल लेकर संकल्प करे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ……… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य स्वर्गकामः द्विजदंपती अहं पूजयिष्ये ॥

संकल्पोपरान्त द्विजदंपति की पूजा करे :

  • एषोऽर्घः ॐ द्विजदम्पतीभ्याम् नमः ॥

  • इदमनुलेपनं ॐ द्विजदम्पतीभ्याम् नमः ॥

  • इदमक्षतं ॐ द्विजदम्पतीभ्याम् नमः ॥

  • एतानि गंध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बूल-नैवेद्य- सिन्दूराभरण-भूषण-वासांसि ॐ द्विजदम्पतीभ्याम् नमः ॥

  • ॐ द्विजदम्पती पूजितौस्थः क्षमेयाथाम् ॥

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