सांवत्सरिक श्राद्ध कहें, क्षयाह श्राद्ध कहें अथवा आब्दिक श्राद्ध कहें अथवा वार्षिक श्राद्ध कहें सबका एक ही तात्पर्य है और वो है प्रतिवर्ष माता-पिता (अन्य का श्राद्धाधिकारी होने पर उसका भी) की मृत्यु तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध। इसे बोलचाल की भाषा में वर्षी अथवा और टूटी बोली में बरखी भी कहा जाता है। ब्राह्मणों में अभी भी ५ वर्ष अथवा और अधिक वर्त्तमान में भी देखने को मिलता है किन्तु जातिमात्र का भेद होने से एक वर्ष देखा जाता था कुछ वर्ष पूर्व तक, वर्त्तमान में वो भी समाप्त होता जा रहा है एवं तेरहवीं को किया जाने लगा है जो की पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध है किन्तु कराने वाले तो कोई-न-कोई पुरोहित ही होते हैं दोषी तो वही हैं।
दोषारोपण यजमान पर करना सरल है किन्तु सिद्ध करना कठिन, यदि यजमान विषपान करने के लिये कहे (प्रचुर धन देकर भी) तो क्या करेंगे ? वहां बुद्धि कार्य करेगी, किन्तु जहां कर्मकांड का विषय आयेगा वहां यजमान जो कहेगा वो कर देंगे और दोषारोपण भी यजमान पर ही लगायेंगे, वाह ! मुख्य दोषी आप ही हैं और यजमान के दोष को भी आप ही ग्रहण कर रहे हैं, यजमान तो दोषमुक्त हो सकेगा कि ब्राह्मण की अनुमति प्राप्त हो गयी किन्तु शास्त्रविरुद्ध करने वाले ब्राह्मण दोषमुक्त नहीं हो सकते।
सामान्यतः लोग श्राद्ध शब्द से ही महापात्र अर्थ ग्रहण कर लेते हैं और इसके कारण जो विकृति आ गयी वो सर्वाधिक ब्राह्मण वर्ग में है कि सांवत्सरिक श्राद्ध में भी महापात्र को ही बुलाया जाता है जो कि सर्वथा अनुचित और शास्त्र मर्यादा के विरुद्ध है। षोडश श्राद्ध प्रेत कर्म होता है जिसमें से सपिंडीकरण में देव-पितृ-प्रेत तीनों कर्म होते हैं इस कारण प्रेतकर्म में महापात्र ही अधिकारी होते हैं, किन्तु देव-पितृ कर्म में पुरोहित वर्ग। सांवत्सरिक श्राद्ध क्या है देव कर्म, पितृकर्म अथवा प्रेतकर्म ? आपका भी उत्तर होगा पितृकर्म है न कि प्रेतकर्म।
यदि प्रेतकर्म नहीं है तो महापात्र की आवश्यकता कहां है ? सांवत्सरिक श्राद्ध यदि एकोद्दिष्ट हो तो पितृकर्म है और यदि पार्वण हो तो देव-पितृ दोनों ही कर्म। इसमें महापात्र की कोई आवश्यकता ही नहीं है अपितु महापात्र हेतु भी सांवत्सरिक श्राद्ध में पुरोहितवर्ग के देव-पितृ संबंधी ब्राह्मण ही अधिकारी हैं एवं उन्हीं के अधिकार में वार्षिक श्राद्ध आता है। संशोधन की कितनी आवश्यकता थी इस विषय से विद्वद्जन स्पष्टतः अवगत हो गये होंगे। किन्तु ब्राह्मणवर्ग में सांवत्सरिक श्राद्ध विषयक इतनी बड़ी विकृति आने का तात्पर्य है कि फिर तो श्राद्ध में और भी अनेकानेक विकृतियां भरी-पड़ी होंगी और थी जिसका संशोधन किया गया है। सभी विषयों का विश्लेषण करके स्पष्ट भी किया गया है जिसका अवलोकन कर सकते हैं :
संशोधित आद्य श्राद्धसंशोधित मासिक श्राद्धसंशोधित सपिण्डीकरण श्राद्ध
“वास्तविक विद्वान वही है जो शास्त्रसम्मत और प्रामाणिक विषयों का आदर करे।”
भूस्वामि भाग विषयक चर्चा पूर्वकृत है, सांवत्सरिक श्राद्ध सामान्यतः स्वभूमि (गृह) में ही किया जाता है अस्तु भूस्वामि भाग अनावश्यक है किन्तु इस विषय में भी गंभीर विकार आ गया था एवं भूस्वामि भाग को श्राद्ध का अंग बना दिया गया। यह कार्य वाचस्पति मिश्र का अनुगमन करने वालों ने भी अपनी पद्धतियों में किया, विकृतियां स्वाभाविक न होकर पद्धतिकारों द्वारा उत्पन्न की गयी। वाचस्पति मिश्र का अनुगमन करते तो संकल्प के पश्चात् ही यदि परकीयभूमि में श्राद्ध किया जा रहा हो तो भूस्वामि पितरों का भाग प्रदान करते न कि भोजन से पूर्व, भोजन से पूर्व देने के कारण यह विकार उत्पन्न हुआ क्योंकि श्राद्ध का अंग समझ लिया गया, चिंतन-मनन की शक्ति, संशोधन का सामर्थ्य तो रहा नहीं।
ऐसे ही मूर्खाचार्य आज यदि संशोधन किया भी गया है तो बकवास करेंगे, किसी भी विषय का प्रामाणिक खंडन मांगा जा है किन्तु इसमें असमर्थ हैं, केवल बकवाद का सामर्थ्य रखते हैं। यहां मूर्खाचार्य पूर्व पद्धतिकारों को नहीं कहा गया है भले ही त्रुटियां हुई हों, हम उन्हीं विसंगतियों का तो निस्तारण आज कर रहे हैं। मूर्खाचार्य उनको कहा जा रहा है जो यह समझ तो लेंगे कि विकृतियां हैं, किन्तु संशोधन अस्वीकार करेंगे।
ये ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का द्योतक है, चहुंओर किसी भी चर्चा में जो देखने को मिलता है वो यह कि स्वयं त्रुटियुक्त भी बक रहे हों तो अड़े रहेंगे, दूसरे पंडित प्रामाणिक रूप से भी कुछ कहें तो अस्वीकार करेंगे क्योंकि मूढ़ हैं, उन्हें लगता है कि इससे अगले की श्रेष्ठता सिद्ध होगी और हमारी मूर्खता। अरे मूर्खाचार्यों तुम लोग अनधिकृत रूप से अभाव के कारण कर्मकांड में पाखंड कर रहे हो यदि संशोधन को स्वीकार नहीं किया तो प्रामाणिक खंडन करो और प्रामाणिक खंडन नहीं कर सकते तो स्वीकार्यता बाध्य है, किन्तु मूढ़ हो, मूढत्व तो प्रकट करोगे ही।
ध्यान रखना यदि ऐसा अपराध किया तो इसका दण्ड भी (दैवीय विधान से) प्राप्त होगा। संशोधन करना मेरा दायित्व था इसको स्थापित करना मेरा दायित्व नहीं है वो शास्त्र स्वयं करेगा और शास्त्रीय आधार से खंडन के बिना अस्वीकार करने वालों को दण्डित भी करेगा।
विकृतियों और इन मूर्खाचार्यों के मूढत्व का प्रदर्शन सांवत्सरिक श्राद्ध में चरम पर होता है। त्रयोदशाह (तेरहवीं) को वार्षिक श्राद्ध नहीं किया जा सकता किन्तु कराते हैं और ब्राह्मण वर्ग में भी ऐसा करने का प्रयास होने लगा है। ब्राह्मणेत्तरों में तो तेरहवीं को ही वार्षिक श्राद्ध व्यवहार बना दिया गया है। अरे मूढ़ों षोडश श्राद्ध के अपकर्षण की आज्ञा शास्त्र में है और इस कारण विद्वानों ने अपकृष्ट किया। वार्षिक श्राद्ध के अपकर्षण की आज्ञा शास्त्रों में नहीं है अस्तु अपकृष्ट नहीं किया जा सकता।
ये एक बार का कर्म नहीं है आजीवन “आदेहपतनात्” कर्म है। कौन करा रहा है यही मूढ़ मूर्खाचार्य करा रहे हैं न, शास्त्रविरोधी होना सिद्ध कर रहे हैं न। यजमान पर दोषारोपण करने से तुम दोषमुक्त नहीं हो सकते क्योंकि तुम्हीं करा रहे हो। वार्षिक श्राद्ध का अपकर्षण नहीं किया जा सकता और पुत्र को आजीवन करना चाहिये। किये गए अपकर्षण का कोई महत्व ही नहीं है अपितु निरर्थक और शास्त्रविरुद्ध है। यदि ये कहो कि यजमान नहीं मानता तो अपनी मूढ़ता ही सिद्ध करोगे क्योंकि मेरा निर्णय तो मानता है।
सांवत्सरिक श्राद्ध में एकोद्दिष्ट और पार्वण दोनों ही विहित है एवं विद्वानों ने इसमें संगति स्थापित किया है। महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र ने इस विरोधाभास का स्पष्ट निवारण इस प्रकार किया है :
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साग्निक पार्वण विधि से ही सांवत्सरिक श्राद्ध भी करे।
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साग्निकों में भी औरसातिरिक्त पुत्र एकोद्दिष्ट विधि से सांवत्सरिक करे।
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निरग्निक एकोद्दिष्ट विधि से ही सांवत्सरिक करे।
इस प्रकार यहां एकोद्दिष्ट अथवा पार्वण संबधी विवाद का निस्तारण पूर्वाचार्य द्वारा प्रदत्त है समस्या केवल यह है कि पूर्वाचार्य की पुस्तक को ही अनुपलब्ध (सुनियोजित) रूप से कर दिया गया। इस विषय में यदि हम प्रामाणिक तथ्य देखें तो वो कुछ इस प्रकार प्राप्त होता है :
त्रिपिण्डमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टं मृताहनि। एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत्॥२३॥
सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशकः। मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानवः॥२४॥
संपृक्तेष्वाकुली भावः प्रेतेषु तु यतो भवेत्। प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्टं समाचरेत्॥२५॥
मत्स्यपुराणम्/१८
इस प्रकार के यदि वचन हैं तो दूसरी ओर एकोद्दिष्ट-निषेधपूर्वक पार्वण को ही प्रशस्त कहा गया है एवं इसी का निराकरण लिखित स्मृति में किया गया है। हम यहां ऐसा कह ही नहीं रहे कि इसके विरुद्ध भी पक्ष है किन्तु दोनों में संगति बैठाने वाला पक्ष भी है ऐसा कह रहे हैं; देखें :
अमावास्या क्षयो यस्य प्रेतपक्षेऽथवा यदि। सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्योक्तः पार्वणो विधिः॥२१॥
अर्थात् अमावास्या अथवा पितृपक्ष में जिसका मरण हो उसके लिये सपिण्डीकरण के पश्चात् पार्वण विधान है, इससे भिन्न के लिये पार्वण नहीं एकोद्दिष्ट ही विहित है।
अब यदि सांवत्सरिक के उचित काल का विचार करें तो वहां मध्याह्न एवं अपराह्न दोनों ही सिद्ध होता है। यदि एकोद्दिष्ट विधि से करेंगे तो मध्याह्न काल में और यदि पार्वण करें तो अपराह्न में होगा। इसी के आधार पर तिथि का भी निर्धारण किया जा सकेगा।
सामान्यतः अब निरग्निक ही हैं अस्तु एकोद्दिष्ट ही मुख्य विधि है, साग्निक औरस के अतिरिक्त। यदि एकोद्दिष्ट विधि से सांवत्सरिक किया जाय तो पृथक पाचक की अपरिहार्यता नहीं होती।
सांवत्सरिक श्राद्ध जिन पुत्रों ने बंटवारा नहीं किया है उनके लिये ज्येष्ठ के कृत में सर्वकृत मान्य होता है एवं जिन्होंने बंटवारा कर लिया है उनमें सभी पुत्रों का कर्तव्य होता है। बंटवारा का मूल तात्पर्य धन और चूल्हा दोनों पृथक करने से है।
क्षयाय विशेष : क्षयाह श्राद्ध के बारे में विशेष यह है कि शास्त्रों में इसे अनिवार्य कहा गया है और त्याग वा कालातिक्रमण करना भी दोषद कहा गया है। आज जो दुर्मतिग्रस्तता देखी जा रही है इसका भी शास्त्रीय कारण क्षयाह का त्याग ही है। साथ ही एक विशेषता और भी कही गयी है वो यह कि वार्षिक श्राद्ध में श्राद्ध से पूर्व पञ्चमहायज्ञ न करे अपितु श्राद्ध के पश्चात् करे। इन विषयों के प्रमाण लघ्वाश्वलायन स्मृति में इस प्रकार प्राप्त होता है :
पितृयज्ञमकृत्वा तु पित्रोरेकाब्दिकं यदि । यज्ञान्यः कुरुते पञ्च स याति नरकं ध्रुवम् ॥१॥
कुरुते ब्रह्मयज्ञं च श्राद्धात्पूर्वं मृतेऽहनि । निराशाः पितरस्तस्य श्राद्धानं न लभन्ति ते ॥२॥
तर्पणं कुरुते पित्रोः श्राद्धात्पूर्वं मृतेऽहनि । निराशाः पितरस्तस्य स च गच्छेदधोगतिम् ॥३॥
कुर्यात्पञ्च महायज्ञान्निवृत्ते श्राद्धकर्मणि । पित्रोराब्दिक एवाऽऽहुराचार्याः शौनकादयः ॥४॥
लघ्वाश्वलायन स्मृति/२४
श्राद्धकालेषु सर्वेषु कुर्याच्छ्राद्धं च शक्तितः । विशेषतो मृताहे तु पित्रोश्चैव विधीयते ॥२६॥
मोहान्न कुरुते श्राद्धं मातापित्रोर्मृतेऽहनि । निराशाः पितरो यान्ति दुर्मतिं चापि वै सुतः ॥२७॥
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा यो मृताहमतिक्रमेत् । स याति नरकं घोरं यावदाभृनसंप्लवम् ॥२८॥
अतिक्रमो मृताहग्य दोषः स्यान्मृतकं विना । न कुर्याच्छ्राद्धमाशौचे प्रवदन्ति महर्षयः ॥२९॥
आचरेद्विधिवच्छ्राद्धं मातापित्रोर्मृतेऽहनि । पितरस्तेन तृप्यन्ति गच्छन्ति पदमुत्तमम् ॥३०॥
सदाचारपरो विप्रः कृपालुः श्राद्धकृत्तथा । आत्मनिष्ठोऽर्थलोकेषु तारयेत्तरति स्वयम्॥३१॥
लघ्वाश्वलायन स्मृति/२४