॥ उद्गारः ॥
संशोधन प्रस्तावक – विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
प्रयच्छन्ति तथा राज्ये प्रीता नृणां पितामहाः ॥ (श्राद्ध कल्पलता – याज्ञवल्क्यस्मृति)
सनातन वाङ्मय की पावन परिधि में “श्राद्ध” केवल एक लौकिक अनुष्ठान या कुल-परम्परा मात्र नहीं हैं, अपितु यह विदेह पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक परम पवित्र, अपरिहार्य और ‘ऋणत्रय’ (देव, ऋषि, और पितृ ऋण) से मुक्ति का आध्यात्मिक महायज्ञ है। श्रुति-स्मृति के महावाक्य सघोष प्रमाणित करते हैं कि श्रद्धा की सात्विक अंतः सलिला से पूरित कर्म ही श्राद्ध की संज्ञा पाता है : “श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन प्रकीर्तितम्”
शास्त्रीय मान्यता है कि दिव्य देव शक्तियों की अपेक्षा पितरगण अतिशीघ्र आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) होते हैं। गरुड पुराण में भी इस तथ्य को परम पुष्ट करते हुए कहा गया है कि – “न हि धन्यातिगा काचित् पितृभक्तेर्गरीयसी” (अर्थात इस चराचर जगत में पितृभक्ति से बढ़कर कल्याणकारी एवं श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है)। उनकी सद्यः प्रसन्नता से ही मानव कुल में दीर्घायु, प्रज्ञा, अक्षय धन, परा-अपरा विद्या, ऐश्वर्य और अंततः मोक्ष की प्राप्ति सुलभ होती है।
किन्तु अत्यंत क्षोभ और चिंता का विषय है कि वर्तमान समय में बढ़ते सामाजिक अपसंस्कारों, कुरीतियों और कतिपय आधुनिक पद्धतिकारों के प्रमाद (अज्ञान व असावधानी) के कारण इस परम पवित्र अनुष्ठान में गंभीर शास्त्रीय विकृतियां आ गई हैं। विशेषकर “सपात्रक” और “अपात्रक” विधानों का जो भ्रामक सम्मिश्रण (खिचड़ी) धड़ल्ले से किया जा रहा है, उसने श्राद्ध की मूल आत्मा और उसकी फलश्रुति को आहत किया है।
इस शास्त्रीय मर्यादा के ह्रास से व्यथित होकर, इस ग्रंथ के संशोधन प्रस्तावक के रूप में मैं (विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज) अनेक लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों के द्वार खटखटाए, उनसे संवाद स्थापित करने तथा इस विकृति के परिमार्जन का भगीरथ प्रयास किया। किंतु काल की विडंबना रही कि वहां से केवल विफलता और उदासीनता ही हाथ लगी। तत्पश्चात दैवयोग और भगवत्कृपा से किसी अन्य विषय (संक्रान्ति निर्णय) आदि को लेकर, पूर्वपरिचित एवं “सुगम श्राद्ध विधि” पद्धतिकार पण्डित दिगम्बर झा जी से उनके आवास पर मिलन हुआ। इसी क्रम में उन्हें इस गंभीर शास्त्रीय संकट और विकृतियों से अवगत कराया। तदनंतर, हम दोनों ने अनेकानेक प्रमाणिक ग्रंथों, स्मृतियों, पुराणों एवं विशेष रूप से महामहोपाध्याय पंडित रुद्रधर झा कृत “श्राद्ध विवेक” और महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र कृत पद्धति आदि कालजयी स्मृतियों व निबंध-ग्रंथों का गहन अनुशीलन और मंथन किया।
अंततः शास्त्रों के मूल सत्यों पर हमारे विचार एकाकार हुए, मतैक्य हुआ और उसी अनवरत शास्त्रीय मंथन के अमृत परिणामस्वरूप आज यह “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” नामक श्राद्ध पद्धति अपने मूर्त रूप में आपके सम्मुख प्रतिष्ठित है। इस पद्धति की सबसे महती विशेषता और वज्र-सदृश सुदृढ़ आधार यह है कि इसमें धर्मशास्त्र के दैदीप्यमान नक्षत्र महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र के अकाट्य सिद्धांतों, तर्कों और उनके सार्वभौमिक शास्त्रीय मतों का आश्रय लिया गया है।
जैसा कि भगवान मनु ने मनुस्मृति में विधि और काल की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए निर्देश दिया है – यस्मिन्नहनि यच्छ्राद्धं तदहर्न व्यतिक्रमेत् – अर्थात् देश, काल और पात्र की शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन किए बिना, निर्दिष्ट तिथि (समय/काल) पर किया गया शास्त्रोक्त कर्म ही अभीष्ट सिद्धि और पितृ-तृप्ति कारक होता है। महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र का “अपात्रक श्राद्ध” संबंधी शास्त्र चिंतन इसी सूक्ष्मता और प्रामाणिकता को रेखांकित करता है; जिसके सम्यक् समावेश से यह नवीन पद्धति सर्वथा निर्दोष, सुग्राह्य और सिद्ध होगी।
इस गौरवमय ग्रंथ के संशोधन प्रस्तावक के रूप में, जब मैंने इस पद्धति की मूल विषय-वस्तु, इसके पाठ्य और इसकी शास्त्रीय अन्विति का गहन अनुशीलन किया, तो मुझे यह देखकर अतीव संतोष हुआ कि इसमें रूढ़िवादिता और आधुनिक भ्रांतियों का समूल उच्छेदन करते हुए शास्त्र मर्यादा का अक्षुण्ण पालन किया गया है। पंडित दिगम्बर झा जी का यह संपादन कार्य श्लाघनीय और वंदनीय है, जिन्होंने सनातन की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए इसे वर्तमान समय के लिए अत्यंत व्यावहारिक और उपयोगी स्वरूप प्रदान किया है।
मेरा यह दृढ और अकाट्य विश्वास है कि यह पद्धति न केवल कर्मकांड के मर्मज्ञ विद्वानों, वेदपाठी पुरोहितों और आचार्यों के लिए एक “प्रामाणिक दिग्दर्शिका” (मार्गदर्शक ग्रंथ) सिद्ध होगी, बल्कि उन सभी सनातनी जिज्ञासुओं और गृहस्थों का भी परम कल्याण करेगी जो अपने पूर्वजों की आत्मिक तृप्ति और अक्षय लोक प्राप्ति हेतु इस मार्ग पर अग्रसर हैं।
इस पवित्र और युगांतरकारी ग्रंथ के सफल प्रकाशन (तत्काल PDF) पर मैं अंतःकरण से अत्यंत हर्ष और संतोष व्यक्त करता हूँ और भगवच्चरणारविंदों में साष्टांग प्रार्थना करता हूँ कि यह कालजयी कृति संपूर्ण जगत के कल्याण, लोक-संस्कारों के संवर्धन और सनातन धर्म की रक्षा में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करे।
श्रद्धया क्रियते यस्मात्, तस्माच्छ्रेयस्करं परम्॥