दाह संस्कार

दाह संस्कार विधान

सोलह संस्कारों में जैसे गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन संस्कार जन्म से भी पहले होते हैं उसी तरह अंतिम संस्कार या अन्येष्टि संस्कार व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत होती है। शरीर पंचभूतों से निर्मित होता है और शरीर से जीवनिर्गमन के पश्चात् संस्कार पूर्वक उसकी अंतिम क्रिया की जाती है जिससे पंचभूतों में शुद्धि बनी रहे। सनातन में शरीर को पञ्चभूतों से निर्मित माना गया है, पञ्चभूत हैं – मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरित मानस में इस प्रकार व्यक्त किया है : “क्षिति जल पावक गगन समीरा। पञ्च रचित यह अधम सरीरा।” दाह संस्कार वास्तव में अन्त्येष्टि संस्कार का एक मुख्य प्रकार है। अंत्येष्टि संस्कार के अन्य प्रकार भी होते हैं यथा भूमि-निक्षेप, जल-प्रवाह। दाह संस्कार ही अन्त्येष्टि संस्कार मुख्य प्रकार होने का मुख्य कारण यह है कि इसमें पाञ्चभौतिक पार्थिव देह को पंचतत्वों में विलीन किया जाता है।

एक प्रश्न : अंतिम क्रिया को संस्कार क्यों कहा जाता है जबकि मृतक का तो जीवन समाप्त हो जाता है, फिर संस्कार की क्या आवश्यकता होती है?

दाह को संस्कार इसलिये कहा गया कि मात्र पाञ्चभौतिक देह का नाश होता है उसमें स्थित देही का नहीं। पञ्चभूतों को मृत देह समर्पित करने से पूर्व देह को संस्कारित करना आवश्यक है अन्यथा पञ्चभूतों में भी देह के दोष व्याप्त हो जायेंगे। लेकिन यदि देह को संस्कारित करके पञ्चभूतों में विलीन करेंगे तो पञ्चभूतों में देह के दोष नहीं जायेंगे क्योंकि दोष तो संस्कार से समाप्त हो जायेंगे। यदि पञ्चभूतों में बिना संस्कार किये देह को विलीन करें तो पञ्चभूत दूषित होंगे जिसका प्रभाव हमारे पाञ्चभौतिक शरीर पर भी होगा, साथ ही उस देहि जिसके देह का संस्कार नहीं किया गया हो में पवित्रता का अभाव हो जायेगा जिससे दुर्गति की प्राप्ति होगी।

सभी संस्कार वेदोक्त हैं, किन्तु सभी संस्कारों में लौकिक व्यवहार अलग-अलग देखा जाता है इस कारण सभी संस्कारों की विधि में क्षेत्रभेदानुसार अंतर देखा जाता है। और कोई भी एक ऐसी विधि नहीं जो सभी क्षेत्रों में प्रचलित हो या मान्य हो। लेकिन लौकिक विधि में अंतर होते हुये भी मुख्य विधि एक ही होती है। यहां जो दाह-संस्कार विधि दी गयी है वह मिथिलादेशीय विधि है अतः मिथिलातिरिक्त अन्य क्षेत्रों की विधि से भिन्नता मिलेगी।

  • गरुड़पुराण में बताया गया है कि यमदूतों द्वारा बंधा हुआ देही का देह जब तक रहता है तब तक वह देह में प्रवेश करने के लिये बहुत व्याकुल रहता है।

  • जब तक मृतशरीर घर में रहता है तब तक उपस्थित लोग रोते-विलखते हैं, अश्रु-थूक-कफ आदि उत्सर्ग करते हैं और यमदूत देहि को बलपूर्वक भक्षण कराता है।

  • इसलिये जब भी किसी की मृत्यु सुनिश्चित हो चुकी हो यथाशीघ्र उसका दाह संस्कार करना चाहिये।

  • यथाशीघ्र दाह संस्कार करने की आवश्यकता के कारण ही रात्रि में भी दाह संस्कार का निषेध नहीं है।

  • दिन में मरने वाले का शव रात में और रात में मरने वाले का शव दिन में पर्युषित अर्थात बासी कहा जाता है।

  • यदि शव पर्युषित हो जाये तो उसके लिये भी पञ्चगव्यादि से शुद्धिकरण का विधान बताया गया है। अस्तु वर्त्तमान में जो शव को लोगों की प्रतीक्षा के करते हुये एक दिन के स्थान पर २ – ३ दिन भी रखने की परम्परा बनती जा रही है यह मृतक के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार है।

  • जिसकी प्रतीक्षा की जा रही हो वो स्वयं ही इसके लिये मना कर दिया करे। पुत्र हो वा पुत्री, भाई हो वा बहन, जीजा हो वा शाला,जिसके लिये भी ऐसा शास्त्रविरुद्ध व्यवहार किया जा रहा है वह दोषी होता है।

  • केवल पुत्रमात्र के लिये प्रतीक्षा की जा सकती है यदि एक भी पुत्र उपस्थित न हो तो। यदि एक भी पुत्र उपस्थित हो तो अन्य पुत्रों की भी प्रतीक्षा न करे।

  • दाह-संस्कार किसी तरह का कोई प्रदर्शन नहीं है अतः दाह संस्कार को प्रदर्शन न बनाकर कर्मकाण्ड का अंग ही बनाये रखें।

  • वर्तमान काल में सम्बन्धियों की प्रतीक्षा करते हुये शव को १ दिन ही नहीं २-३ दिन भी रखा जाने लगा है जो मृतक और सम्बन्धी सबके लिये कष्टकारक है।

  • यदि कर्माधिकारी पुत्र घर में न हो तो मात्र उस पुत्र के आने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिये, यदि वह आ रहा हो। पुत्र से भिन्न की प्रतीक्षा में शव को रखा नहीं जा सकता साथ ही यदि अनेक पुत्रों में से एक पुत्र भी उपस्थित हो तो अन्य पुत्रों की भी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती।

रात्रि में दाह

रात्रि में दाह का निषेध नहीं है यह समझ लेना आवश्यक है अन्यथा अब तो लोग ऐसा भी कहने लगेंगे कि रात्रि में दाह का ही निषेध है।

रात्राै वा रात्रिशेषे वा म्रियन्ते चेद्द्विजातयः। दाहं कृत्वा यथान्यायं द्वाै पिण्डाै निर्वपेत्सुतः ॥

यदि रात्राै दहेत्तस्य समाप्तिर्दहनस्य तु। परेऽहन्युदिते सूर्ये कार्या तस्याेदकक्रिया ॥

दग्धस्य तु न वै कार्या जातु उदकक्रिया ॥

रात्राै दग्ध्वा तु पिण्डान्तं कृत्वा वपन वर्जितम्। वपनं नेष्यते रात्राै स्वस्तनी वपनं क्रियेति ॥

अब एक वचन जो निषेधपरक है :

सन्ध्यायां वा तथा रात्राै दाहः पाथेय कर्म च। नवश्राद्धं च नाे कुर्यात्कृतं निष्फलतां व्रजेत् ॥

वास्तव में यह संध्या या रात्रि में दाह का निषेध नहीं कर रहा है अपितु दिन में जिसकी मृत्यु हुई हो उसके लिये दिन में ही दाह करने के लिये कहता है।

स्मार्तों के लिये छन्दोग परिशिष्ट, वाचस्पत्यम्, मदनरत्न आदि में दाह संस्कार की विधि इस प्रकार बताई गई है :-

दुर्बलंस्नापयित्वातु शुद्धचैलाभि संवृतम् । दक्षिणा शिरसं भूमौ बर्हिष्मत्यांनिवेशयेत् ॥घृतेनाभ्यक्तमाप्लाव्य शुद्धवस्त्रोपवीतिनम् । चंदनोक्षित सर्वांगं सुमनोभिर्विभूषयेत् ॥
हिरण्य शकलान्यस्य क्षिप्त्वाछिद्रेषुसप्तसु । मुखेष्वथापिधायैनं निर्हरेयुः सुतादयः ॥
आमपात्रेग्निमादाय प्रेतमग्निपुरःसरम्। एकोनुगच्छेत्तस्यार्ध मर्धपथ्युत्सृजेद्भुवि ॥ऊर्ध्वमादहनंकार्यमासीनोदक्षिणामुखः । सव्यंजान्वाच्यशनकैः सतिलंपिंडदानवत् ॥अथपुत्रादिराप्लुत्य कुर्याद्दारुचयं महत् । तत्रोत्तानं निपात्यैनंदक्षिणाशिरसंमुखे ॥
आज्यपूर्णंस्रुवंदद्याद्दक्षिणाग्रांनसिस्रुचम्। पादयोरधरांप्राचीमरणीमुरसीतराम् ॥
पार्श्वयोः शूर्पचमसौसव्यदक्षिणयोः क्रमात् । सुसमेतुन्यसेन्युब्जमंतरूर्वोरुलूखलम् ॥
चात्रोविलीढम त्रैव अग्नयेरप्ययंविधिः । अपसव्येनकृत्वैतद्वाग्यतः पितृदिङ्मुखः ।
अथाग्निसव्यमावृत्को दद्याद्दक्षिणतःशनैः ॥

यद्यपि यह छन्दोग की विधि है तथापि मिथिला में छन्दोग और वाजसनेयी दोनों में लगभग यही विधि थोड़ा सा और परिवर्तित रूप में प्रचलित है। शवयात्रा विधि के अनुसार श्मशान आकर अंत्येष्टि संस्कार करे। मैथिलेत्तरों की शवयात्रा और अंत्येष्टि विधि पृथक होती है।

  • नग्न शव का दाह करना निषिद्ध है, अतः शव को वस्त्र अवश्य दे।

  • इसी प्रकार पूर्ण दाह का भी निषेध है, दग्ध का अवशेष रहना चाहिये। आदित्यपुराण का वचन है : निश्शेस्तु न दग्धव्यः शेषं किञ्चित् त्यजेत्ततः।

दाह संस्कार करने वाली अग्नि घर से ही ले जाने की आज्ञा है। यह कार्य एक अलग व्यक्ति करे और आधे रास्ते में अग्नि का आधा भाग त्याग/गिरा दे।

चाण्डालाग्नि का निषेध : चाण्डालाग्निरेध्याग्निः सूतिकाश्च कर्हिचित् । पतिताग्निश्चिताग्निश्च न शिष्टग्रहणोचितम् ॥ – देवल, अतः दाहाग्नि स्वयं ही प्रज्वलित करना चाहिए, किसी से लेना ही नहीं चाहिए । बहुत जगह डोम से अग्नि लेने की परम्परा देखी जा रही है, जो कि शास्त्रानुमोदित नहीं है ।

दाह विधि

शव-दाहकर्ता स्नानादि कर नवीन श्वेत-वस्त्र-यज्ञोपवीत-कटिसूत्र-उत्तरीयवस्त्र आदि धारण कर ले । मृतक को दक्षिण शिर करके स्वयं पूर्वाभिमुख होकर एक नये मिट्टी के पात्र में जल लेकर त्रिकुशहस्त होकर जलपात्र में तीर्थों का आवाहन इन मंत्रों से करे :-

ॐ गयादीनि च तीर्थानि ये च पुण्याः शिलोच्चयाः । कुरुक्षेत्रं च गंगां च यमुनां च सरिद्वराम् ॥ कौशिकीं चन्द्रभागां च सर्वपाप प्रणाशिनीम् । भद्रावकाशां सरयूं गण्डकीं तमसां तथा ॥ धैनवं च वराहं च तीर्थं पिण्डारकं तथा । पृथिव्यां यानि तीर्थानि चतुरः सागरांस्तथा ॥

तीर्थावाहित जल एवं अन्य जल से मृतक को अच्छी तरह स्नान कराकर नवीन वस्त्र-यज्ञोपवीत-चंदन- गंगौट-फूलमाला आदि पहना दे । चिता पर कुश बिछाकर उत्तर सिरहाना कर मृतक को सुला दे (पुरुष को अधोमुख और स्त्री को उत्तानमुख सुलाये।)

दक्षिणाभिमुख अपसव्य होकर बांये हाथ में जलता हुआ अंगारा लेकर नीचे का दोनों मंत्र पढ़ते हुए चिता की तीन बार परिक्रमा करे :-

ॐ कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्यजानता । मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पंचत्वमागतम् ॥१॥ धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोह समावृतम् । दहेयं सर्व गात्राणि दिव्यान्लोकान् स गच्छतु ॥२॥

  • तीन बार चिता की परिक्रमा करके मुखाग्नि प्रदान करे (अग्नि शिर की ओर लगाये।) फिर अनेक पवित्र वस्तुओं लकड़ी, रूई, घी, धूप, धूना कपूर, चन्दन, लकड़ी आदि का अग्नि में प्रक्षेप करते हुए शवदाह करे।

  • जब जलते हुए शव का कपोत (कबूतर) आकार का अवशेष बचे तो प्रादेश प्रमाण 7 लकड़ी लेकर चिता की सात बार परिक्रमा करते हुए प्रत्येक बार 1 लकड़ी इस मंत्र से चिता में प्रक्षेप करे :- ॐ क्रव्यादाय नमस्तुभ्यं ॥ इसके साथ-साथ प्रत्येक प्रदक्षिणा में उल्मुक पर कुठार से प्रहार करने के लिये भी बताया गया है।

  • गंगा तट पर शवदाह करने वाले समस्त अस्थि व चिता-भस्मादि का गंगा में तत्क्षण ही उत्सर्जन कर देते है। लेकिन गंगातट से दूरस्थ समाज में अन्यत्र शवदाह होता है जहां चौथे दिन अस्थिसंचय कर अस्थि का गंगा-प्रवाह किया जाता है ।

दाहोत्तर नियम

  • दाह-संस्कार करने के बाद सभी व्यक्ति, वृद्ध आगे और बालक पीछे रहते हुये, पीछे की ओर देखे बिना जलाशय आये।

  • इस समय चलने का भी एक विशेष नियम बताया गया है : पैर से पैर का स्पर्श किये बिना चले । पैर से पैर के स्पर्श नहीं करने का तात्पर्य यह है कि आगे वाला पैर आगे ही रखे, पीछे वाला पैर पीछे ही रहे। चलने का सामान्य तरीका यह है कि क्रमशः दोनों पैर आगे-पीछे होते हैं।

  • जलाशय आकर वस्त्र-सहित एक डुबकी लगा ले (सचैल स्नान करे) जल में प्रवेश करने का भी विशेष नियम यही है पहले सबसे वृद्ध प्रवेश करे और तदुपरांत वृद्धक्रम से ही अन्य व्यक्ति जल में प्रवेश करे।

  • शरीर पोंछे बिना ही दक्षिणाभिमुख-अपसव्य होकर बांए हाथ के अनामिका व अंगूठा से दक्षिण दिशा में निम्न मंत्र से जल प्रदान करे :- ॐ अपनः शोशुचदघम् ॥

  • फिर शरीर पोंछे, जलाशय से बाहर आकर प्रक्षालित वस्त्र धारण करे।

उदकदान (तिलाञ्जलि)

दक्षिणाभिमुख-अपसव्य होकर सभी व्यक्ति मोड़ा, तिल, जल लेकर इस मंत्र से मृतात्मा को तिलांजलि प्रदान करें – ॐ अद्य …….. गोत्र ………. प्रेत एष तिलतोयांजलिः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

पुनः स्नान करके घर को प्रस्थान करे । मृतव्यक्ति के घर पर आकर निम्न मंत्रों को पढ़ कर क्रमशः लोहा, पत्थर आग और जल स्पर्श करे :-

  1. ॐ लौहवद् दृढ़कायोस्तु ॥ – लोहा । फिर जलस्पर्श करे।

  2. ॐ अश्मेव स्थिरो भूयासम् ॥ – पत्थर । फिर जलस्पर्श करे।

  3. ॐ अग्निर्नः शर्म यच्छतु ॥ – आग । फिर जलस्पर्श करे।

  4. तत्पश्चात् बिना मंत्र के ही जल छूकर, सभी अपने घर को प्रस्थान करे ।

स्नानादिकोपरांत दशगात्र पिण्डदान की विधि गंगातट पर शवदाह करने वाले वहीं प्रारम्भ कर देते हैं । अतः मृतक के मृत्यु दिवस से गिनते हुए दाह दिवस तक के पिण्ड दान करना चाहिए । विशेषतः एक ही दिन में दाह-क्रिया होती है अतः एक ही पिण्ड दिया जाता है पर रात्रिमरण होने पर दाह-संस्कार अगले दिन होने से, दो दिन की मान्यता से दो पिण्ड देना चाहिए। जन्म-मृत्यु में सूर्योदय से सूर्योदयपर्यन्त 1 दिन माना जाता है ।

यदि सायंकाल समय शेष हो तो घटदान करे, प्रातः काल प्रतिदिन दशगात्र पिण्डदान करे।

अन्यत्र उषाकालादि का प्रमाण नित्यकर्म व व्रतादिपरक है । तथापि व्रतादि में भी स्मार्तों के लिये सूर्योदय से ही वार का आरम्भ विचार किया जाता है। ज्योतिष में भी सूर्योदय से ही वार-प्रवृत्ति होती है।

पति-पत्नी की एक क्रिया

  • यदि पति और पत्नी की मृत्यु एक साथ हो गयी हो तो दोनों का दाह भी एक साथ ही करे।

  • यदि दोनों में से किसी एक की मृत्यु हो गयी हो और दाह करने से पूर्व दूसरे की भी मृत्यु हो जाये तो भी दोनों का दाह-संस्कार एक साथ ही करे।

  • एक साथ दाह संस्कार करने का तात्पर्य एक ही चिता पर पति-पत्नी दोनों का दाह-संस्कार करना भी है।

  • किन्तु उपरोक्त सभी स्थितियों में पिण्डदान अलग-अलग करे।

  • यदि एक चिता पर पति-पत्नी का दाह-संस्कार किया गया हो तो पिण्डदान भले ही अलग होगा, किन्तु पाक एक ही होगा।

  • पिण्डदानादि सभी क्रियायें पहले पिता की फिर माता की करे।

पञ्चक दाह शान्ति

पंचक में दाह होने की शांति का तात्पर्य है मरण यदि पंचक में न हुआ हो तो भी यदि दाहकाल में पंचक हो तो पंचक दाह की शांति करे किन्तु उक्त स्थिति में पञ्चक मरण शांति की आवश्यकता नहीं होती। पञ्चक दाह में शांति हेतु कुशाओं को ऊर्णादि सूत्र से वेष्टित करके पांच पुत्तल निर्मित करके, यवपिष्ट उपलेपित करे।

पांचों पुत्तलों की पूजा क्रमशः प्रेतवाह, प्रेतसखा, प्रेतप, प्रेतभूमिप और प्रेतहर्ता नामों से करे। पूजन हेतु देवता के नाम में अंतर भी देखने को मिलता है और नक्षत्र देवता के नाम से भी पूजा करने का विधान देखा जाता है यथा : ॐ वसुभ्यो नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ अजैकपदे नमः, ॐ अहिर्बुध्न्याय नमः, और ॐ पूष्णे नमः।

पूजा के उपरांत क्रमशः सिर, दक्षिण कुक्षि, वाम कुक्षि, नाभि और पैरों के मध्य में पांचों पुत्तल रखे। पांचों पुत्तलों पर क्रमशः घृताहुति प्रदान करे :

  • प्रेतवाहय स्वाहा ॥

  • प्रेतसखाय स्वाहा ॥

  • प्रेतपाय स्वाहा ॥

  • प्रेतभूमिपाय स्वाहा ॥

  • प्रेतहर्त्रे स्वाहा ॥

इस प्रकार से पंचक दाह में शांति करे। मैथिलेत्तरों में संकल्पादि पूर्वक पूजा विधि भी देखने को मिलता है किन्तु मैथिलों में नहीं। पुत्तल प्रयोग होता है किन्तु घृताहुति का न होना दोषद है घृताहुति आवश्यक है। 

तदनन्तर शव को अग्निप्रदान करे।

पञ्चक दाह विधि व मरण शान्ति अन्य आलेख में प्रकाशित की जायेगी। यदि पञ्चक में दाह किया जा रहा हो तो उसके लिये एक विशेष विधि है। पञ्चक मरण और पञ्चक दाह दोनों अलग-अलग क्रिया है।

  • यदि किसी की मृत्यु श्रवण नक्षत्र के अंत में भी हुई हो तो वह पंचक मरण नहीं होगा किन्तु उसका दाह पञ्चक में होगा इस कारण पञ्चक दाह विधि की आवश्यकता होगी।

  • किन्तु यदि किसी की मृत्यु रेवती के अंत में हो और दाह अश्विनी में हो रहा हो तो वहां पञ्चक दाह विधि की नहीं पञ्चक मरण शांति किया जायेगा।

  • यदि किसी की मृत्यु पञ्चक में हुई हो और दाह संस्कार भी पञ्चक में ही करना हो तो उसका दाह भी पञ्चक विधि से करना चाहिये एवं उसके लिये पञ्चक मरण शांति भी करे।

पञ्चक विशेष

सजातीय भोज के विषय में शास्त्र के प्रमाण

तिलान्ददतपानीयंदीपं ददतजाग्रतः । ज्ञातिभिः सह भोक्तव्यमेतत्प्रेतेषुदुर्लभम् ॥ – भारत : तिल, जल, दीपकदान, जागना और सजातियों के साथ भोजन (भइयारी भोज) ये सभी प्रेत के लिये दुर्लभ होता है, अर्थात बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रथमेह्नितृतीयेच सप्तमेदशमेतथा । ज्ञातिभिः सह भोक्तव्यमेतत्प्रेतेषुदुर्लभम् ॥ – मरीचि : पहले दिन, तीसरे दिन अथवा सातवें दिन सजातियों के साथ भोजन (भइयारी भोज) ये सभी प्रेत के लिये दुर्लभ होता है, अर्थात बहुत महत्वपूर्ण है।

आशौचमध्ये यत्नेन भोजयेच्च स्वगोत्रजान् ॥ – ब्रह्मपुराण, शुद्धितत्व आदि में कहा गया है कि अशौच के मध्य में यत्नपूर्वक अपने गोत्रियों को भोजन कराये।

तैलाभ्यं गोबांधवानांमंगसंवाहनं च यत्। तेन चाप्यायते जंतुर्यच्चाश्नन्ति स्वबान्धवाः ॥ – मार्कण्डेय पुराण : तेल लगाकर स्नान कराना, अंगमर्दन कराना, बंधु-बांधवों को भोजन कराना यह सब प्रेत को प्राप्त होता है अर्थात प्रेत का पुष्टिकारक होता है।

आजकल शिक्षित होने का अर्थ यह समझ लिया गया है कि कुतर्क करने पटु हो, सनातन धर्म, कर्मकांड, परम्परा आदि का खण्डन करे, निंदा करे। इसी में एक चीज भोज की व्यवस्था है और भोज को बंद करने के लिये सनातन द्रोहियों द्वारा अथक प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन भोज की प्रमाणिकता और आवश्यकता दोनों है।

जिस विधि, नियम का शास्त्रों में प्रमाण हो उसका विरोध करना क्या धार्मिक आस्था पर प्रहार करना नहीं है ?

प्रेत पुष्टि भोज